Review: Swatantra Veer Savarkar

Review: Swatantra Veer Savarkar शुरू करने से पहले यह कहना चाहूंगा कि हमारी generation ख़ुशक़िस्मत है, कि हम ऐसे समय में हैं.. जब Information का Flow बेहद व्यापक है.. और ऐसी कई दबी कुचली कहानियाँ हैं, तथ्य हैं. जो सामने लाये जा रहे हैं जिनके बारे में हमें पता ही नहीं था. फ़िल्म की बात करें तो Technically बहुत अच्छी बनी है चाहे Filming हो, art डायरेक्शन हो, Background music हो, डायरेक्शन हो या Acting हो अधिकतर Aspects में फ़िल्म अच्छी बन पड़ी है.

Swatantra Veer Savarkar

कथानक में कहीं कहीं कमी लगती है वहीं ढेर सारे किरदारों का आना जाना लगा रहता है इस कारण First Half में फ़िल्म Swatantra Veer Savarkar थोड़ी सी भटकी लग सकती है लोगों को लेकिन यह भी देखना पड़ेगा कि 7-8 दशकों की कहानी को 3 घंटे से कम समय में दिखाना बेहद मुश्किल काम है ऊपर से कई नये किरदारों और उनके योगदान को दिखाया गया है यही कारण है थोड़े से confusion का.

फ़िल्म Swatantra Veer Savarkar की शुरुआत होती है 1896-97 के Plague महामारी से कल फ़िल्म देखने से पहले मुझे इस बारे में पता नहीं था. इस महामारी से लाखों लोग मारे गए थे और इसका प्रकोप सबसे ज्यादा महाराष्ट्र और आस पास के इलाकों में था. कमाल की बात है कि 1897 में पहली बार भारत में Plague के टीके को बनाया गया, उससे पहले इंग्लैंड से आता था.

बहरहाल फ़िल्म में दिखाया गया है कि भारतीयों की उस समय औकात क्या हुआ करती थी. अंग्रेजों से बचकार भाग रही माँ बेटे को अंग्रेज अफसर एक ही गोली से shoot करता है Scene साधारण है, लेकिन इसके मायने बहुत हैं. एक भारतीय इस लायक़ भी नहीं समझा जाता था, कि उस पर गोली waste की जाए.

लाखों मृत भारतीयों को सामूहिक रूप से जलाया गया था उन्हें अंतिम संस्कार तक मुहैया नहीं था शायद उसके बाद कोरो-ना काल में हमने यह त्रासदी फिर से देखी. सावरकर का परिवार तो जैसे अभिशप्त था ढेरों जुल्म हुए. उसके बाद भी तीनों बेटे अच्छे पढ़े लिखे और अच्छे प्रोफेशन में आये, हालांकि मन में जल रही स्वतंत्रता की आग ने उनके रास्ते बदल दिए.

Swatantra Veer Savarkar
Swatantra Veer Savarkar

फ़िल्म में एक बात अच्छे से बताई गई है. जो अभी तक हम सुनते ही आए थे. हमारे क्रांतिकारियों की सेक्रेट सोसाइटी हुआ करती थी. और ना सिर्फ देश भर में, बल्कि जर्मनी, इंग्लैंड, फ़्रांस जैसे देशों में भी भारतीय क्रांतिकारियों का नेटवर्क था.

फ़िल्म में दिखाया है कि कैसे श्याम जी कृष्ण वर्मा, भीकाजी कामा और मदनलाल ढींगरा जैसे लोगों ने विदेश में सेक्रेट नेटवर्क बना रखा था. इन लोगों ने कई दशकों तक विदेशी धरती पर रह कर भारत की सेवा की और ऐसे माहौल में जब उन पर विदेशी सेक्रेट एजेंसीयों की नज़र रहती होगी फिर भी यह लोग डिगे नहीं. यह शायद पहली बार किसी फ़िल्म में इतने व्यापक रूप से दिखाया गया है.

Swatantra Veer Savarkar

फ़िल्म Swatantra Veer Savarkar में कुछ नेताओं के आपसी संवादों को दिखाया गया है. उसमे हो सकता है थोड़ी artistic liberty ली गई हो, जैसे सावरकर -गाँधी, सावरकर-भगत सिंह, सावरकर – सुभाष चन्द्र बोस आदि के संवाद हैं. फ़िल्म में एक timeline चलती रहती है. और उस समय की कुछ घटनाओं को दिखाया गया है. इसमें यह भी साफ दिखता है कि कैसे कांग्रेस बनी और किस तरह से कांग्रेस के एक ख़ास वर्ग ने आज़ादी की लड़ाई पर एकाधिकार बना लिया.

कुछ क्रन्तिकारी मारे गए  कुछ को Sideline कर दिया गया सावरकर की timeline देखेंगे तो पाएंगे कि वह पुणे के समय से ही आजादी की लड़ाई में नेतृत्व की भूमिका में आ गए थे फिर लंडन जा कर तो उनका प्रभाव और भी व्याप्त हो गया था फिर अंग्रेज सरकार ने उन्हें दुगना आजीवन करावास दे कर और फिर कालापानी भेज कर उन्हें sideline ही कर दिया. लेकिन इतना कुछ होने के बावजूद सावरकर ने अपना वजूद बनाये रखा और अंग्रेज सरकार के सबसे बड़े दुश्मन बने रहे.

फ़िल्म में यह सब दिखाया गया है कैसे देश में ब्रिटिश राजघराने के कार्यक्रम होते थे हमारी तत्कालीन राजनीतिक पार्टियां उनकी जीहुजूरी करती थी. वहीं Swatantra Veer Savarkar जैसे लोग कालापानी में हंटर खाते थे. कोल्हू में जुत कर तेल निकालते थे पेशाब पखाने से भरे काल कोठरी में सड़ते थे वहीं कांग्रेस के नेताओं को महलो में नज़रबंद किया जाता है सभी सुविधाओं के साथ.

फ़िल्म Swatantra Veer Savarkar के इंटरवेल से just पहले कालापानी का अध्याय शुरू होता है और यकीन मानिये यह बड़ा ही खौफनाक दिखाया गया है ऐसी ऐसी यातनाएं दी जाती थी जिसके बारे में सोच कर ही सिहर जाएंगे फ़िल्म Swatantra Veer Savarkar में सावरकर की तथाकथित mercy plea के बारे में खुल कर बताया गया है रणदीप ने बकायदा पूरी plea पढ़ी है Plea किन परिस्थिती में लिखी गई, किसके लिए लिखी गई यह सब देख सुन कर लगता है कि इसमें कुछ भी गलत नहीं था.

फ़िल्म में कई मजबूत तकनीकी पक्ष हैं जैसे 4th Wall Break रणदीप हुड़्डा ने इसका अच्छा प्रयोग किया है हिंदुत्व और हिन्दू शब्दों और इनके अर्थ के बारे में बताया है. जो प्रभावी लगता है और इन Concepts की साफ विवेचना की गई है. आजादी के असली कारणों में थे सेकंड world war के बाद इंग्लैंड की बुरी हालत Royal नेवी, Airforce की बगावत, नेताजी बोस की आजाद हिन्द फ़ौज के कारनामे लेकिन इन तथ्यों को बड़ी ही बारीकी से साफ कर दिया है हमारे इतिहासकारों ने.

रणदीप हुड़्डा तो जैसे इस रोल के लिए ही धरती पर आये हैं वो हर सीन में आग उगल रहे हैं जैसे कि उनके अंदर सावरकर की आत्मा है, और वह अपनी अनकही बातें बताना चाहती हैं. उनके नवयुवक सावरकर का अवतार हो या इंग्लैंड में Mature होता क्रन्तिकारी हो एक गृहस्थ जीवन जीने वाला पति हो, बेटे की मृत्यु से टूटा बाप हो,कालापानी में खौफनाफ सजाएं पाने वाला कैदी हो.

जिंदगी में बार बार चोट खाया इंसान हो,  स्वतंत्रता संग्राम में sideline कर दिया गया सेनानी हो,  अखंड भारत की दिन रात बात करने वाला इंसान हो, जो बंटवारे से इतना परेशान हो गया था कि हृदयघात आ गया था. मिलिट्री ट्रेनिंग की वकालत करने वाला इंसान हो या फिर आजादी के बाद भी हर छोटी मोटी बात पर जेल में डाल दिए जाने वाला व्यक्ति हो. रणदीप हुड़्डा ने हर aspect को दिल दिमाग आत्मा से जिया है. इस फ़िल्म में रणदीप हैं ही नहीं जो है वह सावरकर हैं.

Swatantra Veer Savarkar
Swatantra Veer Savarkar

मैंने कुछ Videos देखे हैं वीर सावरकर जी के और हुड़्डा ने उन्हें हुबहू दर्शाया है Body language एकदम बेहतरीन है हाथों का उपयोग करना दाँत भीच कर बोलना दांतो का गंदा होना (cellular जेल में कहाँ toothpaste मिलता होगा ) यह सब दिखाया हैऔर बिलकुल सच्चा लगता है.

फ़िल्म में जब जब भी महात्मा गाँधी आते हैं एक अजीब सी खीज होती है यह लगता है कि यह कितने Disconnected थे Ground Realities से अन्य कलाकारों जैसे अमित सिआल, अंकिता लोखंडे, राजेश खेड़ा आदि ने कमाल का काम किया है. फ़िल्म में art डायरेक्शन और sets काफी अच्छे तरीके से बनाये गए हैं. किरदारों के कपडे, रहन सहन, उनका बोल चाल काफी हद तक सटीक है. पुराने समय के पूना, मुंबई, दिल्ली, लंदन आदि को अच्छे से दिखाया है.

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कुछ Reviewers ने कहा है कि फ़िल्म में एकतरफा इतिहास ही दिखाया गया है जबकि सच यह है कि अब तक हमें एकतरफा इतिहास ही दिखाया जाता है अब इतिहास के अनकहे अनछुए पहलु दिखाये जा रहे हैं.

कुल मिलाकर यह फ़िल्म देखने लायक़ है एक तो इसमें ऐसा Subject दिखाया है जो दिखाने पर किसी को भी typecast कर दिया जायेगा. रणदीप हुड़्डा को पहले दिन से पता होगा, कि यह फ़िल्म बना कर वह अपना करियर दांव पर लगा रहे हैं हो सकता है उन्हें बॉलीवुड में काम ही ना मिले या फिर उन्हें Mainstream से अलग कर दिया जाए जैसे सावरकर को कर दिया गया था. रणदीप हुड़्डा ने risk ले कर यह काम किया है अपनी जिंदगी की सबसे बेहतरीन Performance दी है यह performance पिछले कुछ सालों में भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन मानी जा सकती है और यह कुछ बड़े कारण हैं, इस फ़िल्म को देखने के.

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