Swatantra Veer Savarkar: स्वतंत्रता की लड़ाई को खास परिवार में सिमट दिया

Swatantra Veer Savarkar: जिस स्पीड से मंथरा वर्ग धुआँ-धुआँ हो रखा है, वाकई सच जूते पहनकर बाहर दौड़ने वाला है। तभी तो देखिए, मंथरा वर्ग के तथाकथित बुद्धिजीवी भागते आयें है और रणदीप हुड्डा को कोसने लगे है। Swatantra Veer Savarkar के ट्रेलर का ब्रेक डाउन करके समीक्षा कर रहे है और अपने लिखें थोथे इतिहास को आधार बनाकर फेक, नैरेटिव और प्रॉपगैंडा करार दे रहे है। अर्थात् जो पीड़ा द कश्मीर फाइल्स से उठा था, पुनः उठ गया है। तिस पर रणदीप ने अपने लेटेस्ट इंटरव्यू के रैपिड फायर राउंड में माफीवीर पर थप्पड़ देने का प्रतिउत्तर दिया तो इससे मंथरा वर्ग का दर्द असहनीय हो चला है।

Swatantra Veer Savarkar

मंथरा वर्ग का मत है कि देश की स्वतंत्रता के पोस्टर बॉय सिर्फ अहिंसावादी और उनकी लॉबी है। या कहे खास परिवार की विरासत में लिखवा दी गई। बाकी सभी तो डरपोक, माफीवीर थे, उनका कोई योगदान न था। इसलिए उन्हें दो-दो कालापानी की सजा दी गई और भगत सिंह को फाँसी भी ऐसे दे दी गई। सुभाष चंद्र बोस भी बैठे बैठे बोर हो चले थे तो नारा दे दिया, ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा’ स्वतंत्रता से कोई लेना देना नहीं था। विकिपीडिया और गूगल वाले इतिहास से सावरकर और भगत सिंह की मुलाकात को काल्पनिक बतला रहे है।

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इन मंथरावादी सोच को आर्टिकल-370 फिल्म के उस सेगमेंट को देखना चाहिए, कि किस प्रकार संविधान की ओरिजनल कॉपी को जम्मू-कश्मीर के सरकारी पुस्तकालय में छिपा रखा था और डुप्लीकेट कॉपी, जिसने क्लोज को डिलीट रखा था, भारत सरकार के पास रखा हुआ था। तक्षशिला, नालंदा पुस्तकालय ऐसे ही थोड़े जलाये गये थे। जो सत्ता में होता है अपने अनुसार इतिहास को बैठता है उठाता है। कोई बड़ी बात नहीं है। वर्तमान सरकार में जो सच है बाहर निकल रहा है तो कलपने लगे है।

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बड़े शान से सदन में खड़े होकर, स्वतंत्रता की लड़ाई को खास परिवार में सिमट दिया और इधर तंज फेंका, ‘इस परिवार ने देश के लिए कुर्बानी दी है आपके यहाँ से कुत्ते का भी योगदान न था’ स्वतंत्रता छोड़िए। स्वतंत्र भारत की राजनीति को देखें। पहले पिता खास प्रकार की लॉबिंग से पीएम बनें, और इनके लिए काबिलियत की नजरअंदाज कर दिया गया। फिर बेटी ने पिता की विरासत समझकर उन नेताओं को ठिकाने लगा दिया था जो डिजर्व करते थे। ऐसा हुनर अचानक नहीं आ जाता है बल्कि हस्तांतरित होता है।

इसलिए मंथरा वर्ग अपने इतिहास से सावरकर की मत मापे, न आपमें उतनी क्षमता है न बुद्धि, सच ज्यादा दिन तक बंदी नहीं रह सकता है। पेंशन वाले कमेंट कसने वालों, सोचो एडविना चाची तो ब्रितानी वायसराय माउंट बैटन की पत्नी थी। उनके संबंधों के लेकर ब्रिटेन के टीवी सीरीज द क्राउन में डायलॉग भी है। और हाँ महेश मांजरेकर जिस बेसिक ड्राफ्ट के साथ चले थे, वह तो पब्लिक डोमेन में था। रणदीप तो गहराई तक उतर गये थे तो मिस मैच होने लगा और भिन्नता आने लगी और महेश अलग हो चले।

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ऐसे में दूसरा निर्देशक लिया जा सकता था। लेकिन नहीं लिया और रणदीप ने बागडोर सँभाली। सेलुलर जेल जाकर फील लिया, शायद वही से सावरकर रणदीप की उँगली पकड़कर ले आये। इसलिए रणदीप ने दोनों पक्षों की किताबों से सावरकर को खोजा और बाहर ला रहे है। रणदीप कलाकार है।

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आज सावरकर से मिलें है कल नेहरू-गांधी से मिलने जाए तो कतई हैरानी न होगी। मंथरा वर्ग राजनीतिक हमला करके कलाकार को कमतर मत करो। जब आप लोगों ने सावरकर के प्रयासों और विचारों को इतिहास में जगह नहीं दी तो फिल्म से सहमति कैसे जता लेंगे। विरोध में ही रहेंगे, आपका भय है कि आपने जो माफीवीर प्रोपेगंडा फैलाया था, फिल्म तोड़ देगी।

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