सबसे पहले तो हमें ट्विटर को अपना सर्वोच्च न्यूज़ सोर्स मानना बंद करना होगा।

2016 में, एक भले मानस ने सुप्रीम कोर्ट में पिटिशन डाली कि देश का नाम इंडिया की बजाए सिर्फ भारत होना चाहिए। तब के चीफ जस्टिस ने यह कहकर इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया कि आर्टिकल 1 के अनुसार, चाचा ही भतीजा है और भतीजा ही चाचा है, माने भारत ही इंडिया है और इंडिया ही भारत है।

हम (CJI) तय नहीं कर सकते हैं एक नागरिक अपने देश को किस नाम से बुलाएगा। वो भारत बोले या इंडिया, उसकी मर्ज़ी है।

दिल्ली वाले क्योंकि अक्सर खाली होते हैं, इसलिए फिर 2020 में दिल्ली के एक बिजनेस पुरुष ने पिटीशन डाली कि क्योंकि इंडिया नाम ग्रीक शब्द indica से लिया गया है, और यह हमारे कल्चर को कहीं से भी रेप्रिज़ेन्ट नहीं करता बल्कि हमें आज भी कोलोनीयल समय की कड़वी याद दिलाता है इसलिए आर्टिकल 1 को अमेन्ड कर, इंडिया पूरी तरह से हटाकर, भारत शब्द को विश्ववापी कर देना चाहिए।

जस्टिस भोबड़े ने इसे भी खारिज कर दिया कि भई चल निकल, बहुत आए तेरे जैसे, गंगाधर ही शक्तिमान है और ऐसे ही रहेगा।

अभी जो नौटंकी चल रही है वो मात्र एक इनविटेशन के कारण है; G20 समिट को रात को भोजन पर बुलाने के लिए राष्ट्रपति जी ने प्रेसीडेंट और इंडिया की बजाए प्रेसीडेंट ऑफ भारत का लेटर हेड बना सबको भेज दिया।

Movierulz (2)

क्योंकि विपक्ष ने अपने गठबंधन का नाम इ।न।डी। या। रख लिया है, तो उन्हें लगा भई ये तो हमसे डर गए और अब संसद में इंडिया को हटाकर पूरी तरह भारत कर देंगे!

राघव चड्ढा ने बढ़िया ट्वीट किया कि “अब हम भारत रख लें तो? मोदी देश का नया नाम ढूँढने लगेंगे”

लेकिन 1949 में, जब देश के नाम को लेकर विचार विमर्श चल रहा था तब ये सुझाव आया कि क्योंकि अब हम ब्रिटिश एरा से निकल चुके हैं, तो इसको पूरी तरह भारत कर देते हैं!

अगर netflix पर दो दिन पहले Animal नहीं देखी हो तो

पर ऐसे कैसे? भारत नाम तो हिन्दू धर्म को रेप्रिज़ेन्ट कर रहा है और ये धर्मशाला तो देश को सर्वधर्म सम्मान वाली बनानी है, इसलिए एक सुझाव हिंदुस्तान का भी आया! किसी ने कही फिर तो भारतवर्ष रख दो, नहीं जी हिन्द रखो!

कॉमेटी ने सोचा ऐसी तैसी में जाओ, अंग्रेज़ ही तो गए हैं देश छोड़कर, अंग्रेज़ी थोड़ी ले गए। हम इंडिया, दैट इज़ भारत, कहकर काम चला लेंगे। दोनों एक ही हैं, किसी में कोई फ़र्क नहीं।

लेकिन इस आलस / टालमटोल के कारण, भारत नाम सिर्फ और सिर्फ भारतीयों के अपने घर तक रह गया और इंडिया, विश्वव्यापी हो गया। इंडियन एयरलाइन्स, टीम इंडिया, इंडियन ऑइल, इंडियाना जोन्स (नहीं वो अलग है) स्टेट बैंक ऑफ इंडिया करके हर जगह, जहाँ भी अंग्रेज़ी में लिखा गया, इंडिया ही लिखा गया।

भारत दब गया। एक भारतीय जीवन बीमा निगम कंपनी है भी, तो उसका अंग्रेज़ी ऐक्रनिम LIC कर दिया, जबकि वो BLIC हो सकता था। पर कोई बात नहीं।

नाम बदल तो कोई रहा ही नहीं है, भारत तो भारत है ही; यहाँ बात इंडिया हटाने की हो रही है, मगर दिक्कत ये है कि बीते 76 सालों में इंडिया ऐसी जड़ों में घुस गया है कि उसे पूरी तरह भुलाने में 75 साल और ढेर सारा पैसा लग जाएगा जो कि अभी हमारे पास फालतू नहीं है।

कहाँ तक हम मदर भारत और चक दे भारत कर हर एक बीती चीज़ का नाम बदलेंगे? हाँ आर्टिकल वन के अनुसार भारत ही इंडिया है और इंडिया ही भारत, तो अपनी बोलचाल में, अपने व्याहवार में, क्रिकेट और हॉकी टीम की जर्सी में और उड़ते जहाज से इंडिया हटाकर भारत कर सकते हैं।

क्योंकि जो बीत गया उसे बदला नहीं जा सकता। बदलने जायेंगे तो मुँह की खायेंगे। हाँ, जो सामने है, आने वाला कल, उसके लिए तैयारी ज़रूर कर सकते हैं। पर उस तैयारी के लिए उसे तो संभालना पड़ेगा न जो हाथ में है; हमारा आज!

और आज की ज़रूरत प्रेसेंटेशन है। आज का दौर दिखावे का दौर है, जो बढ़िया प्रेसेंटेशन के साथ अच्छी सर्विस प्रवाइड करेगा, वो देश आने वाले समय का सबसे चमकता सितारा होगा। अब उस सितारे का नाम भारत होगा या इंडिया, ये हम तय कर लेंगे। इसके पीछे करोड़ों फूंकने की कोई ज़रूरत तो नहीं लगती।

0Shares

Leave a Comment

0Shares