नवाब मंसूर अली खान पटौदी को महानता की श्रेणी में इसलिए भी रखा गया क्योंकि

नवाब मंसूर अली खान पटौदी को महानता की श्रेणी में इसलिए भी रखा गया क्योंकि उन्होंने मिथक तोड़ा, वो एक राजघराने से होने के बावजूद भी फील्डिंग में जबरदस्त थे.. प्रशंशकों ने उनका नाम उनकी टाइगर जैसी फुर्ती की वजह से

‘टाइगर’ रखा था।

इससे पहले फील्डिंग को एक ओछा काम कहा जाता था, और गरीब अमीर तबके से क्रिकेट भी ग्रसित था.. बड़े लोग बैटिंग तो घण्टो करते थे बौलिंग करते थे लेकिन गरीब और नीचे तबके के लोग फील्डिंग के कामों में लगते थे..

राजघराने सपॉन्सर करते थे, उनके हिसाब से क्रिकेट गवर्न होता था, वरना कहीं आने जाने के पैसे तक नही होते थे।

इसका भी कारण था..

क्रिकेट में न तो उतना धन पैसा मिलता था और न ही बोर्ड उतना धनाढ्य था.. दिलीप सरदेसाई बताते हैं कि उनके वक्त में एक मैच खेलने का ₹50 रुपया मिलता था। न तो टीम के साथ डॉक्टर होता था, कपड़े धुलने के पैसे भी नही मिलते थे,

Movierulz (1)

फील्डिंग करते फील्डर कपड़े गंदे होने के डर से डाइव तक नही मारते थे..

फिर यह पैसा 50 से ढाई सौ हुआ, जब टीम ने

सीरीज वगैरह जीते तो पैसे और मिलने चालू हुए.. आज जिस तरह खिलाड़ी विज्ञापन करते हैं तब किसी को यह नसीब होता था।

ये वो जब भारत विश्वकप जीता तब अचानक से उछाल आया और पैसे मिलना चालू हुआ। विज्ञापन..

लेकिन फील्डिंग का स्तर बहुत ज्यादा नही बढ़ा… और किसी भी चीज को सुधरने में समय लगता है.. गांगुली के वक्त तक फील्डिंग को नजरन्दाज किया जाता था।

फिर आगे चलकर फिटनेस टेस्ट होने चालू हुए.. वरना पहले बॉलर अगर बौलिंग में ठीक है और बैट्समैन बैटिंग में तो वो टीम में होता ही था..

पहले जिस तरह खिलाड़ी कुछ मैच में खुद

को बाहर कर लेते थे, आज दबाव इतना है कि एक बार बाहर हो जाएं तो मौका न मिले…

खैर भारतीय क्रिकेट ने बहुत बदलाव देखा है.. लेकिन सबसे बेहतरीन उसका डेमोक्रेटिक होना है.. जैक लगाकर कोई एक दो गेम में जा भले सकता है लेकिन बिना परफॉरमेंस रुकना असम्भव है.. टीम में रुकना उसी को है, जिसके पास क्रिकेट है…

अफवाह पर ध्यान मत दीजिये और किसी खिलाड़ी के एक दो फेलियर पर अपना मीठापन मत जाहिर कीजिये।

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