मैं बीते जन्म में शाकाहारी सेठजी था

मैं बीते जन्म में शाकाहारी सेठजी था। वो ही सेठजी, जिसे आप राम-लखन नामक चलचित्र में बनियागिरी करते देख चुके हैं।

मेरी एक राधा बेटी थी। उसको परेशान करने के लिए एक लड़का लखन अक्सर आ जाया करता था। एक बार वो आया तो बोला देखो मैं शाकाहारी अंडे लाया हूँ। मैंने उसे वहाँ से जाने के लिए कहा, इसबीच उसने मांसाहारी अंडे मेरे आसन पर रख दिए।

जब मैं वापस बैठने लगा तो मेरा मूर्ख नौकर “सेठजी, सेठजी करने लगा” पर मैं तो अंडों पर बैठ गया! मैंने उसे टोका भी “काशिराम, तूने मुझे पहले क्यों नहीं बताया”

उसने बहाना बनाया “मैं कह तो रहा था सेठजी, सेठजी, पर आपने सुनी ही कहाँ”

मैं भड़का “अरे मूरख, सेठजी सेठजी नहीं, तुझे अंडे-अंडे कहना चाहिए था”

पर वो गाय सी शक्ल बनाकर बोला “आपही ने तो अंडों का नाम भी लेने से मना किया था न”

बात तो सही थी! पर मैंने नहीं मानी!

फिर मैंने आगे चलकर एक और जन्म लिया। इस जन्म में मैं लेखक हूँ। मैं हर विषय पर लिख सकता हूँ। लोग कहते हैं कि मैं अच्छा लिखता हूँ। मुझे भी यही लगता है कि मैं अच्छा लिखता हूँ।

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पता है क्यों?

क्योंकि मैं शाकाहारी हूँ और मैं समाज को भी पकड़ पकड़ के शाकाहारी बनने का संदेश भी देता हूँ।

शाकाहारी में भी मिलावटी शाकाहारी नहीं, निरमा शुद्ध नमक से शुद्ध शाकाहारी! अंग्रेज़ी के वीगन बनने की प्रेरणा देता हूँ। पर दुनिया सीधे से कहाँ मानती हैं, इसलिए मैं जब भी किसी मांसाहारी को देखता हूँ, तो मैं आपा-पा लेता हूँ। जैसे मूर्ख लोग आपा खो देते हैं, वैसे मैं आपा पा लेता हूँ।

मेरे घर के सामने एक कवाब का ठेला था, मैंने उसे इतना धोया कि अब वो गोभी-प्याज़ वाली उबली हुई नमकीन गुजिया बेचने पर मजबूर हो गया!

मैं किसी फेसबुक मित्र को तगड़ी की तस्वीर के साथ देख भर लूँ तो उसे अनफ्रेंड कर देता हूँ। झींगा-मच्छी सुन भी लूँ तो ब्लॉक देता हूँ। लेकिन मैं नारी-विरोधी नहीं हूँ, इसलिए कोई महिला अगर चिकन-मटन-बीफ (छी-छी शिव-शिव-शिव) के बारे में पोस्ट करे तो मैं उन्हें आराम से, अलग से समझाता हूँ।

2002 में आई राज़ एक ऐसी फिल्म थी जिसने हमारी चूलें हिला दी थीं।

एक अनपढ़ झींगुर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी वाला ज्ञान दे रहा था कि वीगनों का
अमृतभोज सोया जिससे टोफू बनता है; की खेती करने के लिए परागुए के जंगल के जंगल काट दिए गए थे! भक्क! फेक न्यूज़ है, अगर सही होती भी तो इसमें कोई क्रूएलिटी नहीं है! जानवर काटो तो चिल्लाता है, पेड़ थोड़ी चिल्लाता है! फ़सल भी तो काटते ही हैं न, अब कल को टेलीग्राम यूनिवर्सिटी वाले कहेंगे कि फसलें भी ज़िंदा होती हैं तो क्या हम माँग लेंगे?

मैं तो चाहता हूँ कि राष्ट्रीय पशु भी बाघ नहीं घोड़ा या खच्चर होना चाहिए। गाँधी जी के देश में एक हिंसक पशु को राष्ट्रीय क्यों बनाना?

मैं क्रूएलिटी और वॉइलेन्स के इतना अगेन्स्ट हूँ कि अगर किसी ने कमेन्ट में चिकन-मटन तो दूर अंडा भी किया न तो वर्चुअली पटक के मारूँगा।

नैपथ्य में – “मैं और मेरी सोया रसमलाई, अक्सर ये बातें करते हैं…”

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