Maharani Webserires: राजनीतिक संरक्षण में अपराध तो दिखाए है

Maharani Webserires: बिहार परिवेश वाले कंटेंट की शूटिंग लोकेशन में मध्य प्रदेश लोकप्रिय है फिल्म मेकर्स इन सेट्स से सूबे को एड्रेस करते है। साथ ही सोचने वाली बात है बिहार में उसके कंटेंट काहे नहीं फिल्माये जाते है। विधानसभा सीक्वेंस जम्मू में शूट किए गए है। Maharani Webserires क्रिएटर सुभाष कपूर और निर्माताओं ने अभिनेता हिमांशु मेहता को सीरीज में दोहरे किरदार सौंप दिए, लेकिन अफसोस दोनों ही किरदारों की हत्या लिखी गई और फोटो पर हार लटके दिखलाए। माना कि दोनों किरदारों की टाइम लाइन अलग पीरियड में थी, फिर भी वर्तमान दौर में कौन करता है।

Maharani Webserires

खैर Maharani Webserires रचयिता सुभाष ने बिहार के 1998-2015 के बीच वाले असल घटनाक्रमों के इर्दगिर्द अपने फिक्शन किरदारों को बैठाया है और काल्पनिक कहानी रची है। हालाँकि रील किरदारों से असल परिदृश्य का सांकेतिक इशारा अवश्य मिलता है। स्क्रीन प्ले इंट्रेस्टिंग और थ्रिलिंग लिखा गया है। दो-तीन सिटिंग में खत्म करने की इच्छा होती है क्योंकि सस्पेंस बढ़िया क्रिएट किया गया है।

Maharani Webserires
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भारतीय सिनेमा में पॉलिटिकल ड्रामा कंटेंट में देखें तो सीरीज प्रथम स्थान पर खड़ी नजर आएगी, लेकिन लेकिन सिनेमाई ड्रामैटिक नजरिये से देखें तो बेहतरीन है। किंतु किरदारों के संकेत को समझें, तो लगता है कि असल छवि से उलट मेक ओवर किया गया है। बाकी बिहार के जंगल राज की घटनायें तो ज्यादा बदतर थी। उन दिनों की सत्तारूढ़ दल के पारिवारिक सदस्यों का कहर कटता था। और आम जनता में बेहद ख़ौफ था। लूटपाट, रंगदारी, तो चरम पर थी।

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राजनीतिक संरक्षण में अपराध तो दिखाए है परंतु जंगलराज के मास्टरमाइंड के लिए नायक वाली सिंपेंथी आती है। बाकी नवीन कुमार की हर बारीकियों में नीतीशे बाबू की झलक दिखी है बल्कि शराबबंदी के पीछे का दरवाजा खोले है। राजनीति दावँ-पेच सॉलिड है, शानदार थ्रिल पीक लेता है। माँझी वाला सीक्वेंस अच्छा लगा, लीची कांड होता तो जोरदार रहता। महामहिम को देखकर पूर्व गवर्नर सत्तू की रिश्वत वाली बातें सच प्रतीत होती है।

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तीसरे सीजन को रिवेंज में रखकर दोनों से कमतर किया, भले शह-मात उम्दा रही। आगे के विस्तार की खिड़की खुली रखी है, वैसे मुख्य किरदार रानी भारती के लिये आगे के प्लॉट में कोरा फिक्शन होना तय है। दरअसल, क्लाईमेक्स ऐसी जगह छोड़ दिया है। बाकी देखते है लेखक की कलम क्या लिखती है। लेखक ने गौरी शंकर पांडे और प्रेम कुमार किरदारों से बतलाया है कि घाघ राजनेता और राजनीति कैसी होती है, रीढ़ तो होवे नहीं करे।

मेरे नजरिये में लेखन टीम असल राजनेताओं से अधिक सेकुलर निकली और ऐसा होना ही था, आखिर बॉलीवुडिया कंटेंट है लेकिन इसमें जातीय समीकरण ज्यादा व्यवस्थित दिखलाए। जय भीम और सामा-चकेवा को फ्रेम में लाये है। अमित सियाल के लिये सिनेमाई संयोग कहेंगे कि वे बिहार के मुख्यमंत्री बनें, तो वही जामतारा सीरीज में झारखंड राज्य से बाहुबली एमएलए भी रहे।

वीएफएक्स तकनीक के दौर में निर्माताओं राजनीतिक ड्रामे में भीड़ जुटाने में कंजूसी की है वे दृश्य पूरी तरह कमजोर लगे। रोड शो, रैली को वीएफएक्स से अच्छा किया जा सकता था। सीरीज काफी समय से वॉचलिस्ट में थी लेकिन सीजन 3 ने देखने पर मजबूर कर दिया। देख ली, कुछ पोस्ट इसी पर होगी, साथ ही कलाकारों की बात होगी।

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