कोटा शहर और दिल्ली का मुखर्जी नगर, ये दो ऐसी खतरनाक जगह

कोटा शहर और दिल्ली का मुखर्जी नगर, ये दो ऐसी खतरनाक जगह हैं जहाँ छात्र घुसते टाइम कुछ और होता है और निकलते टाइम (अगर निकल पाए तो) कुछ और!

कहते हैं कि फ़िलवक्त सिनेमा का वो दौर है जब लार्जर देन लाइफ फिल्में ही बॉक्स ऑफिस पर हिट हो सकती हैं, आम जन के लिए कम बजट वाली प्यारी-प्यारी फिल्में अब OTT के भरोसे ही रह गई हैं पर…बीते साल आई 12th फेल मेरी अबतक थिएटर्स में देखी वो पहली फिल्म थी, जिसने भर कटोरे आँसू रुलाया था।

इस फिल्म में एक सीन है कि मनोज सारे काम धाम छोड़कर, रोडवेज़ की बस पकड़कर, श्रद्धा के घर पहाड़ों में जाता है पर वहाँ उसे श्रद्धा की बजाए उनका सेवक मिलता है। यहाँ मनोज और श्रद्धा की एक टेलिफ़ोनिक कन्वर्सैशन है जिसमें सिर्फ मनोज दिखाई दे रहा है। श्रद्धा के रिजेक्शन के बाद मनोज बिना पानी पिए वापस दिल्ली के लिए निकल जाता है।

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ये पूरा सीन चार मिनट से ऊपर का है और वन शॉट वन टेक है। इस सीन को देखने के बाद विधु सर (विधु विनोद चोपड़ा) के लिए मुँह से जितनी तारीफ़ें निकलती हैं उनको मिला लें तो अच्छा मजबूत पुल बन सकता है। ये अकेला सीन ऐसा है कि जिसपर 10 अवॉर्ड दिए जा सकते हैँ पर इसके इतर भी, फिल्म का हर सीन रियलिज़्म और कन्विक्शन की अनूठी मिसाल लगता है।

ये कन्विक्शन ही शायद वो वजह है जिसके चलते फिल्म देखते-देखते 4-5 बार आँखें भर आती हैं। पिता का पुत्र से आटा चक्की पर मिलना, अंशुमन पुष्कर का जबरदस्ती आटा चक्की छुड़वाना या इंटरव्यू से ठीक पहले श्रद्धा की चिट्ठी पढ़ना… हर एक सीन fairy tale में रियलिज़्म का ग़जब कॉम्बिनेशन नज़र आता है।

इस फिल्म में आप मनोज की हालत देखें तो किसी भी आम लोअर मिडिल क्लास व्यक्ति से अलग नहीं दिखेगी। पैसे, इज़्ज़त और परिवार की अखंडता के लिए जूझता हर व्यक्ति हर दिन इतना स्ट्रेस तो कमा ही लेता है कि अपनी कहानी खत्म कर सके! ज़िंदगी से घबराकर खुद का ‘दी एंड’ लिख सके, पर वो नहीं करता।

बगल में छोरा शहर में ढिंढोरा

ये कड़वा सच है कि बढ़ती आबादी के साथ पूंजीवादी व्यवस्था एक तरफ प्रतिस्पर्धा लाती है और दूसरी तरफ करप्शन को जन्म देती है। प्रतिस्पर्धा सिर्फ पढ़ने लिखने या नौकरी पाने की ही नहीं बल्कि आत्मसम्मान के साथ-साथ लग्ज़री ज़िंदगी पाने की भी हो तो ज़िंदगी टॉर्चर बनने लगती है। इस पाने के खेल में कितना कुछ दाँव पर लगाना पड़ता है ये उन कोटा और मुखर्जी नगर के बच्चों से कहीं ज़्यादा उनके माँ-बाप जानते हैं। किसी की लीला समाप्त हो जाती है तो दुख होता ही है, यहाँ न जजमेंट पास करने का मन करता है न ही उस कृत्य को सही ठहराने की हिम्मत होती है।

पर इतना ज़रूर है कि जब किसी फिल्म में किसी aspirant को IPS बनने से बस एक कदम दूर, इंटरव्यू चेयर पर बैठकर, मुसकुराते हुए ये कहते सुनता हूँ कि “मैं इंटरव्यू क्लेयर नहीं भी कर पाया तो भी कोई दिक्कत नहीं, जो अबतक सीखा है वो अपने गाँव जाकर, आने वाली पीढ़ी को सिखाऊँगा, अफसर न सही, शिक्षक बनकर देश बेहतर करूँगा”; तो लगता है कि मनोज कुमार शर्मा जैसे आइकॉनिक हीरो और विधु विनोद चोपड़ा जैसे फाइनेस्ट डायरेक्टर, इस देश के युवाओं के साथ-साथ उनके माता-पिता को भी मोटिवेट करने के लिए बहुत ज़रूरी हैं।

(12th फैल को फिल्मफेयर मिलने की बहुत बहुत बधाई। अगर आप ये फिल्म देख चुके हैं तो आप अपना फेवरेट सीन बताइए)

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