जब कोई अभिनेता किसी किरदार के लिए गहराई तक उतर जाए तो समझ लो

जब कोई अभिनेता किसी किरदार के लिए गहराई तक उतर जाए तो समझ लो, उसने किरदार को अपना बॉडी स्पेस देने के लिए कितने करीब से जाना होगा। ताकि जब किरदार भीतर आएगा और बॉडी लेंगवेज में हाव-भाव और नेचर दिखाएगा तब कलाकार की तैयारी ही काम आती है और किरदार कलाकार की लिमिट तोड़कर नेक्स्ट लेवल पर निकल जाता है।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कलाकार ने उस स्तर की तैयारी कर रखी होती है जिससे किरदार को भी मजा आता है। जब कलाकार कॉलम में रणदीप हुड्डा लिखा हो, तब मामला अलग ही लेवल पर पहुँच जाता है। रणदीप हुड्डा! इन दिनों तिहरी भूमिका में है, लेखक-निर्देशक और कलाकार तो है ही, स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर से मुलाकात करने निकले है।

जानते है रणदीप पहले बतौर कलाकार फिल्म से जुड़े थे और फिल्म को अभिनेता-लेखक-निर्देशक महेश मांजरेकर निर्देशित करने वाले थे। लेकिन महेश और रणदीप के बीच स्क्रिप्ट को लेकर बात जमी नहीं और उन्होंने फिल्म छोड़ दी। ऐसे बीच पड़ाव में कैप्टन शिप छोड़ दें तो बहुत मुश्किल आती है इसलिए इस घटनाक्रम ने रणदीप को निर्देशन डेब्यू दे डाला, इतना ही नहीं रणदीप ने शुरू से लिखना शुरू किया। क्योंकि अगर निर्देशक महेश भी होते तब भी वीर सावरकर से मिलने के लिये उन्हें जानने जाना पड़ता।

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हालिया इंटरव्यू में रणदीप कहते है, कि वीर सावरकर को ज्यादा लिखा नहीं गया है। सावरकर की छवि के बारे में सिर्फ एक लाइन में परिभाषित कर दिया कि ‘अहिंसावादी लोग थे, वे हिंसा में मरे, उनको आमरण अनशन में कुछ नहीं होता था’। इसे सपाट तंज में लेवें।

दूसरा जो हिंसावादी रहे, ‘वे आमरण अनशन से मरे’ अर्थात् सावरकर की इमेज को षड्यंत्र करके कमतर किया गया और माफीवीर भी उसी कड़ी का हिस्सा रहा। रणदीप आगे कहते है, कांग्रेस के नेताओं को कभी काला पानी की सजा क्यों नहीं हुई। स्वतंत्रता के बाद देश में तीन ही बड़ी पार्टी थी। कांग्रेस, मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग पाकिस्तान लेकर अलग हो गई। बची कांग्रेस और हिंदू महासभा, गांधी की मौत में गोडसे के साथ सावरकर को जोड़कर उनकी पार्टी को खत्म किया गया ताकि कांग्रेस के सामने कोई विकल्प नहीं बचे।

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हुआ भी ऐसा ही है सिर्फ दो व्यक्तित्व को चमकाने के चक्कर में बाकियों को धूमिल कर दिया गया। इसपर भी रणदीप बढ़िया कहते है, ‘हमें बचपन से पढ़ाया गया है कि स्वतंत्रता अहिंसा से मिली’ ऐसा मुमकिन है। इंटरव्यू देखेंगे तो मालूम होगा कि ये बातें रणदीप नहीं बल्कि स्वयं वीर सावरकर कह रहे हो, अगर कोई सावरकर के बारे में इतना गया है तो यक़ीनन वीर के विचारों को पढ़ा होगा और देश के प्रति उनके विचार समझे होंगे।

तभी तो अटल कह गये।
सावरकर माने त्याग,
सावरकर माने तप,
सावरकर माने तत्व,
सावरकर माने तर्क,
सावरकर माने तारुण्य,
सावरकर माने तीर,
सावरकर माने तलवार।

यूँ तो रणदीप ने खूब किरदार को अपने शरीर में उतारा है लेकिन वीर सावरकर के बाद हुड्डा में अलग ही परिवर्तन देखने को मिला है। जब एंकर पूछते है कि इस कंटेंट पर किसी ने फिल्म बनाने की हिम्मत नहीं की, आपने की। तब रणदीप कहते है शायद सावरकर ने मुझे चुना हो। फिल्म अच्छे शेप में निकली तो बवाल काटेगी।

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