फिल्म इंडस्ट्री में यश चोपड़ा एक बड़ा नाम थे, हैं और रहेंगे।

साथ ही ये भी सच है कि भारतीय में जब पब्लिक लॉजिक नहीं ढूँढती है तो कलाकार दिमाग लगाने वाले कौन होते हैं? सिनेमा ड्रामा बेस्ड चलता है। एक हॉरर फिल्म में सब जानते हैं कि घर के बाहर हिरोइन गई तो उसको भूत पकड़ लेगा, पर फिर भी हिरोइन जाती है और फिर भी हम देखते हैं।

बात बस इतनी सी थी कि सनी देओल एक नवल ऑफिसर के कैरेक्टर में थे और शाहरुख खान एक साइको लवर के रोल में। सनी का कहना था कि जब मैं एक ट्रेंड ऑफिसर हूँ तो कैसे कोई सरफिरा मुझे सामने से चाकू मार सकता है? पर स्क्रिप्ट की डिमांड थी कि सुनील मल्होत्रा पब्लिक की नज़र में मरे, हिरोइन समेत पब्लिक के मन में डर बैठे!

पब्लिक सोच में पड़ जाए कि अब क्या होगा? अब तो राहुल क-क-क-किरन को दबोच ही लेगा! लेकिन अंत में हीरो वापस आकर हिरोइन को बचा ले, क्लाइमैक्स सम्पन्न हो और पब्लिक खुशी-खुशी घर जाए।

पर नहीं, सनी देओल का कहना था कि अगर चाकू मारना ही है तो ऐसे मारो कि सुनील को दिखे ही न, सामने की बजाए पीठ पर वार हो, पर यश चोपड़ा शायद कुछ और चाहते थे।

हालाँकि फिल्म में भी यही दिखाया है कि सनी देओल का ध्यान शाहरुख के बार-बार माफी माँगने से भटक जाता है। पर चाकू लगता पेट में ही है।

इस सीन पर भड़के सनी देओल ने गुस्से में अपनी ही जींस फाड़ ली थी।

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दरअसल उनके हाथ जींस की जेब में थे, गुस्सा बहुत आ रहा था और ज़ोर कोई चल नहीं रहा था तो उन्होंने गुस्से में अपने हाथ ऐसे बाहर निकाले कि जींस की जेबें फट गईं। क्रू डर गया।

बस इतनी सी बात थी! या शायद इतनी सी बात नहीं थी!

सनी देओल फिल्म के लीड हीरो थे पर वह देख रहे थे कि शाहरुख पर फुटेज ज़्यादा है। वह यह भी देख रहे थे कि उनका कैरेक्टर सुनील टिपिकल है पर शाहरुख का कैरेक्टर राहुल ज़रा हट के मटीरीअल है। नेगेटिव है पर eye-catching है।

फिल्म रिलीज़ हुई और ब्लॉकबस्टर बनी। शाहरुख के पास अवार्ड्स का ढेर लग गया। सनी देओल ने कसम खा ली कि वह कभी शाहरुख के साथ काम ही नहीं करेंगे।

इनफैक्ट, उन्होंने फिर यश राज के साथ कोई फिल्म ही नहीं की। हालाँकि राज कुमार संतोषी, अनिल शर्मा, जेपी दत्ता, गुड्डू धनोआ जैसे फिल्ममेकर्स की किस्मत सनी के भरोसे चमक गई।

पर सनी की ज़्यादतर फिल्में एक ही तरह के कैरेक्टर, एक ही प्रकार की कहानी दिखाती रह गईं और दूसरी तरफ शाहरुख खान अच्छे रिश्तों, एंगेजिंग कहानियों और बॉय-नेक्स्ट-डोर वाली इमेज लिए किंग ऑफ बॉलीवुड बन गए।

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जबकि मेरी नज़र में सनी देओल की स्क्रीन प्रेसेंस, उनका औरा और एक्टिंग स्किल ऐसी थीं कि वह पिता धर्मेन्द्र की भांति, तरह-तरह के कैरेक्टर्स कर एक से बढ़कर एक बढ़िया सिनेमा दे सकते थे। पर वह सिंगल स्क्रीन पर तालियाँ पड़वाकर ही संतुष्ट हो गए।

जबकि बात लॉजिक से शुरु हुई थी! सनी देओल की किस फिल्म में लॉजिक, फिज़िक्स, ग्रैविटी, कॉमन सेंस आदि होता है? कितनी ही बॉलीवुड फिल्में हैं जो सेंस के साथ बनती हैं?

एक आदमी गुस्से में किसी का हाथ उखाड़ सकता है? ट्रक ड्राइवर ट्रेन चला सकता है? सारा शरीर जल जाए पर पेन का ढक्कन न जले, ऐसा किस ग्रह पर मुमकिन है?

पर ये सब फिल्मों में हम देखते हैं, हमें अच्छा भी लगता है। मज़ा भी आता है।

अभी गदर 2 ब्लॉकबस्टर हुई तो उसकी सक्सेस पार्टी में सनी देओल ने शाहरुख को भी बुलाया। शाहरुख आए भी। अब जवान की सक्सेस पार्टी में सनी देओल बुलाए जायेंगे।

फिर बॉर्डर 2 या इंडियन 2 (भारतीय 2) कि पार्टी में एसआरके….

देर से ही सही, सनी देओल को समझ तो आ गया होगा कि ईगो से सिर्फ और सिर्फ उनका नुकसान हुआ!

2016 में आई घायल वंस अगेन के इंटरव्यू में उनसे पूछा कि आप की नज़र में अब इस वक़्त सबसे बढ़िया एक्शन स्टार कौन है?

तो सनी ने जवाब दिया कि “अभी तो मैं खुद ही हूँ, मेरे बाद कौन होगा देखेंगे” हालाँकि तब वह 58 साल के थे।

खैर, अब हो सकता है आने वाले समय में शाहरुख और सनी एक साथ नज़र आयें। ट्रेंड को फॉलो करते हुए डर 2 बनाई जाए!

अगर ऐसा हुआ तो, आपको क्या लगता है कि फिल्म हिट होगी? हिट हो गई तो शाहरुख और सनी के नाम पर आपस में सींग भिड़ाते इनके हाई-आई क्यू फैंस का क्या होगा?

ईगो की EMIs से लदे कहीं ये बिचारे जॉबलेस तो नहीं हो जायेंगे?

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