Bastar The Naxal Story तिरंगा फहराने की सजा में माओवादियों ने 32 टुकड़े कर दिये थे

Bastar The Naxal Story – जानते है 15 अगस्त 2023 के दिन बस्तर में सैकड़ों गाँवों ने कई दशकों बाद तिरंगा फहराया था, तो वही कुछ गाँव ने तो स्वतंत्रता के बाद 2023 में भारत के झंडे को सैल्यूट किया। Bastar The Naxal Story ! लेखक-निर्देशक सुदिप्तो सेन बतलाते हैं कि तिरंगा फहराने की सजा में माओवादियों ने 32 टुकड़े कर दिये थे। विपुल शाह की Bastar The Naxal Story, उन बदतर हालातों को दिखलाती है जब बस्तर को नक्सलियों ने बंदी बना रखा था। हालाँकि अब भी है लेकिन सीमित कर दिया है।

Bastar The Naxal Story


स्क्रीन प्ले ग्रिपिंग और थ्रिलिंग है, कई भयावह सीक्वेंस सामने से गुजरते है तो रोंगटे खड़े हो जाते है। लेखक ने जितने इवेंट्स रखे है उनके बारे में पढ़ा अवश्य था, निर्ममता अब देखी है। गुरिल्ला युद्ध का कोई नियम नहीं होता है, दुश्मन बेहद निचले स्तर तक गिर सकता है और अक्सर ऐसे युद्ध कायर-डरपोक और धोखेबाज लड़ते आये है। जे हादी आतंकी हो या नक्सली इन सभी को गुरिल्ला की सख्त ट्रेनिंग दी जाती है। तभी तो निहत्थे पर वॉर करते आये है। सामने की लड़ाई में कभी नहीं आते है। खास पैटर्न है।


क्रूर, निर्दयी और बेरहम, कट्टर बनाने के लिए ब्रेन वाश लिया जाता है, स्वप्नरचित संविधान की क़सम खिलाई जाती है। आतंक हो या नक्सल, दोनों का सिस्टम एक ही है और मकसद भी कमोबेश सेम है, तानाशाही। बल्कि जॉइंट वेंचर में रणनीति बनती है और एग्जीक्यूट होती है। इसे बड़े बिज़नेस एम्पायर में समझेंगे तब अच्छे से समझ आएगा। लेके रहेंगे आजादी, सिर्फ स्लोगन भर है। असलियत में इसे ऐसे सुने, ‘जनरेट करते रहेंगे फंड्स’।

Bastar: The Naxal Story
Bastar The Naxal Story


कलयुगी दुनिया में सच और शांति अर्थात् पीस निर्धन है, कुछ नहीं है, इनके पास कोई कतई रहना नहीं चाहता है कौन गरीबी में जीवन व्यतीत करेगा जबकि झूठ, फेक, नैरेटिव, प्रॉपगैंडा व अशांति बेहिसाब अमीर है। पूरा बिज़नेस इसी पर निर्भर है। फिल्म में लेखक ने बताया है कि सिस्टम में सभी सुचारू रूप से कार्य करें, इसके लिए 600 करोड़ का बजट लगेगा। बल्कि दुनिया के बड़े बड़े देशों की अर्थव्यवस्था इसी पर निर्भर है। भारत में अशांत सूबे या क्षेत्र उठाकर देख लें।

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सभी सिस्टम से कनेक्ट है और इसका केंद्र बिंदु जेएनयू है। कुछ लोग यह लिखने पर कहते है कि यहाँ से बड़े बड़े राजनेता निकले है इसे काहे बदनाम किया जाता है। तो सच यह भी है इसकी जड़ों में कितने धूर्त अर्बन नक्सल, आई एम सॉरी बुद्धिजीवी बैठें है जो पूरे बिज़नेस एम्पायर को चला रहे है, मजबूत नेटवर्क बिछा रखा है। सभी ऐश कर रहे है और जमीनी स्तर पर ब्रेन वॉश्ड लाल लड़ाके गुरिल्ला खेल खेल रहे है। इनकी हौसला अफजाई में नाच-गाना होता है। 76 जवानों को धोखे से गुरिल्लाओं ने मारा था तब दिल्ली के जेएनयू में जश्न का माहौल था। तब तत्कालीन सरकार चुप देखती रही क्योंकि सिस्टम है न, अंदर तक सिस्टम के बोर्ड ऑफ़ मेंबर्स बैठें है। न जाने कितने एनजीओ, मानवाधिकार संगठन एक्टिव हो जाते है। नक्सल पर कार्यवाही दूर, सेना से जवाब तलब किया जाता है।


पुलवामा अटैक में सभी पूछे थे ये क्यों हुआ? 76 जवानों की मौत पर कोई कुछ न कह सका, पूछ सका। मीडिया के सामने उल्टे जवानों को दोषी ठहराया गया। जिसने ऐसा वक्तव्य दिया था वह न्याय यात्रा निकाल रहा है। मशहूर अभिनेता, लेखक ने अपने इंटरव्यू में साफ शब्दों में कहा है कि वामपंथ के चक्कर में बर्बाद हो गया। आपसे सबकुछ छुड़वा देंगे, लेकिन खुद कुछ नहीं छोड़ेंगे। छोड़ेंगे काहे, बिज़नेस जमाया है तो लाभ भी लेंगे।

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मार्क्सवादी, माओवादी, लेनिनवादी, सभी की विचारधारा एक ही है बस अंतर में पालक पनीर, शाही पनीर, मटर पनीर, जितना फर्क है। फिल्म में गृहमंत्री और आईपीएस नीरजा माधवन की मीटिंग बड़ी रोचक है, इसमें सच कितना है और ड्रामा कितना, इसकी खबर नहीं, लेकिन सोचने पर मजबूर करता है। उसी के बिनाह पर मेरा आँकलन है। फिल्म की समीक्षा में तकनीकी कुछ भी नहीं लिखा है क्योंकि ये फिल्म नहीं, अपितु कड़वा सच है और बहुतेरे आयेंगे और झूठ फेक के साथ खड़े होकर सच को दबायेंगे। क्योंकि सच कौन है? और हाँ नीरजा माधवन जिस भाषा में बोली है ठीक कहती है किनको बैठा रखा।

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