बारिश मतलब घनघोर बारिश, ऐसी मूसलाधार बारिश कि पूरा नगर डुबा दे।

ऐसी ठंडी हवाएं थी उस शाम कि बड़े से बड़े सूरमा, रक्षक भी चौकीदारी छोड़ अपनी कोठरियों में दुबके पड़े थे।

कैसा दिल कलपा देने वाला समां होगा वो माँ देवकी के लिए कि उसके सामने नवजात शिशुओं को एक के बाद एक, उसी के भाई ने पटक-पटक कर मार डाला।

कितना इंतज़ार किया होगा उस माँ ने, उस एक रात का कि जब तुम्हें आना था कान्हा। सैकड़ों आँखें सिर्फ इस देख-रेख में थीं कि तुम आओ तुम्हें मार दिया जाए। हज़ारों दिल इस उम्मीद में थे कि तुम आओ तो कुछ बेहतर हो।

लाखों लोग इस दुविधा में थे कि तुम वाकई कोई भविष्यवाणी हो या बस दिल के बहलाने को वासुदेव ये ख्याल अच्छा है!

पर तुम आए, आँधी तूफान बरसात सब एक किनारे रह गई और तुम सबके ऊपर , सबसे ऊपर अपने पिता के सिर पर बिराजे, कब एक माँ से दूर और दूसरी माँ के करीब पहुँच गए किसी को कानों कान खबर न हुई।

तुम्हें आना ही था केशव, तुम्हें आना ही था, किसी के लिए तुम सब कुछ बने तो किसी के लिए मात्र एक कहानी! पर वो कहानी भी इतनी शक्तिशाली कि तुम्हारा नाम भर लेने से चेहरे पर मुस्कान और दिल में तसल्ली आ जाती है कि… तुम हो न, तुम सब संभाल लोगे।

Movierulz (1)

– बचपन में जन्माष्टमी पर मोहल्ले वालों ने अचानक तय किया कि मुझे कृष्ण बनाएंगे और झाँकी लगाएंगे। न मैं श्याम वर्ण, न मेरे नैन-नक्श तीखे, न तब मुझे बाँसुरी बजानी आती थी और न ही मैं कहीं का नायक था।

मैं बस इस आस में था कि ये जो साँवली लड़की राधा बन रही है, काश इसका कृष्ण मैं होता, काश इसके साथ झूले पर मैं बैठा होता। ये मुझसे उम्र में बड़ी है, राधा भी तो कान्हा से बड़ी थीं। ये मुझसे लंबी भी है, राधा भी ज़रूर लंबी होंगी!

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इसी उधेड़बुन में था कि मन की सुन ली गई, जो राधा बन रही थी उसके पिता ने ही ये घोषणा की कि मुझे कृष्ण बनाया जाए।

तब तो मैं तुम्हें ठीक से जानता नहीं था गोपाल, बस तुम्हारे माखन चुराने, बंसी बजाने और पूरे महाभारत के सूत्रधार बनने के चंद किस्से सुने थे। पर उस जन्माष्टमी पर, 12 बजे से कुछ समय पहले, जाने मुझे क्या हुआ था कि एक कृष्ण भजन पर मैं ऐसा नाचा ऐसा नाचा कि वहाँ खड़े सैकड़ों लोग बस ताली बजाते रह गए।

जाने इतनी हिम्मत कैसे आ गई! मैं तो स्टेज देख घबरा जाने वाला बालक था। उस दिन से पहले भी, उस दिन के बाद भी, पर उस रोज़, पीले वस्त्र पहने, मोरपंख लगाए, बाँसुरी थामे और अपने निकट ही बैठी राधा को देख, सब भूल गया था मैं।

या वो मैं था ही नहीं, वो तुम ही थे गिरधर, वो तुम ही थे।

कन्हैया लाल माणिकलाल मुंशी जी लिखिक तुम्हारे जन्म का प्रसंग जब-जब पढ़ता हूँ, तबतब आँखें भीग जाती हैं।

यूँ लगता है कि तुम्हें आना ही था, तुम थे, तुम हो और तुम हमेशा रहोगे।

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