बच्चे नहीं हैं, टाइम बॉम्ब हैं ये

“बच्चे नहीं हैं, टाइम बॉम्ब हैं ये…”

शौर्य फिल्म किसी ने नहीं भी देखी होगी तो भी के-के मेनन का ये ब्रेथटेकिंग सीन ज़रूर देखा होगा।

पर अगर आप फिल्म देखें तो इस सीन के पीछे की कहानी भी समझ आएगी।

मैं जिन दिनों स्कूल में था, तब बच्चों को ‘सबक’ सिखाने के लिए उन्हें थप्पड़ मारना, हाथ ऊँचे करके खड़ा कर देना, मुर्गा बनाना बड़ा आम था। लेकिन इसमें भी सबसे खराब तब लगता था जब होमवर्क पूरा न होने पर अपने ही दोस्तों को पीटने के लिए कहा जाता था।

ये फिज़िकल टॉर्चर के साथ-साथ मेंटल हेरस्मेंट भी था। इसीलिए 1 अप्रैल 2010 से, राइट टू एजुकेशन (फ्री एंड कम्पल्सरी) RTE के तहत फिज़िकल और मेंटल हेरस्मेंट क्राइम बना दिया गया और बच्चों को ‘याद’ कराने के लिए होने वाले इस टॉर्चर का अंत हुआ!

पर नहीं, मैं दिल्ली में पढ़ा हूँ इसलिए मुझे लगा कि अंत हुआ,पर छोटे गाँव-कस्बों-शहरों में मार कुटाई का ये तांडव आज भी बरकरार है!

तृप्ता त्यागी की वीडियो में आवाज़ आती है कि “धीरे धीरे क्यों मारा? ज़ोर से मारो!”

“इन मोमडनों की मायें इन्हें नानी के घर ले जाती हैं बार-बार, जिसके चलते इनकी पढ़ाई खराब होती है”

इतनी घटिया और सीमित सोच वाले अगर शिक्षक हों तो भविष्य क्या ज़हर निकलेगा इसकी कल्पना भी मुश्किल है!

देश में दो चीज़े ऐसी हैं जिन्हें वॉर फुटिंग पर बदलने की ज़रूरत है!

एक – पर्सेप्शन

फलाने धर्म के हैं तो ऐसे ही होंगे, बच्चे ज़्यादा ही होंगे, हर वक्त मामा के यहाँ ही जाती होंगी, ये तो आतंकवादी ही होंगे! ये तो पोंगे ही होंगे, इनके दिल में तो नफ़रत ही होंगी! ये तो रहते ही गंदे में हैं!

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नहीं, किसी भी एक धर्म, ज़ात, स्थान आदि, जो पैदा होते वक़्त खुद नहीं चुने जा सकते; से जुड़े दो लोग एक से ही हों, ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं है। मैंने ऐसे बिहारी भी देखे हैं जिन्हें चावल पसंद नहीं और ऐसे मुस्लिमों से भी मिला हूँ जो शुद्ध शाकाहारी हैं! तो जरनलाइज़ करना बंद करना होगा।

दूसरा – एजुकेशन सिस्टम और इस सिस्टम के कलपुर्जे

वो टीचर अपनी सफाई में भी बौड़मपन की मिसाल देती हुई कह रही है कि बच्चे को ‘टाइट’ रखने के लिए अब थोड़ा तो सखत होना पड़ेगा, थोड़ी तो मार लगानी पड़ेगी! सीरीअसली?

बारिश मतलब घनघोर बारिश, ऐसी मूसलाधार बारिश कि पूरा नगर डुबा दे।

ये बात टीचर तो टीचर पेरेंट्स तक को गांठ मारकर गले से टाँगनी पड़ेगी कि पीटकर, टॉर्चर कर आपका बच्चा कुछ नहीं सीखेगा, अगर कुछ सीखेगा तो बस आपसे नफ़रत करना। यही नफ़रत वो आगे बड़ा होकर अपने से छोटो पर आजमाएगा।

तृप्ता त्यागी को पद से हटाना तो ज़रूरी है ही, इनके ऊपर ऐसी सख्त कार्यवाही भी होनी चाहिए, कि बाकी जो इस तरह से बच्चों को पीट रहे शिक्षक हैं पर अबतक उनकी वीडियो नहीं आई है, उनके हाथ भी किसी बच्चे पर अब कभी उठने से पहले ठिठकें ज़रूर।

और रही बात बच्चों की, तो वो एक फिल्म का एक डाइलॉग भर है, बच्चे टाइम

बॉम्ब नहीं टाइम मशीन होते हैं, वो टाइम मशीन जिसमें हम अपना फ्यूचर देख सकते हैं! हम इस टाइम मशीन के साथ जैसा व्याहवार करेंगे, हमें ठीक वैसा ही फ्यूचर हमें नसीब होगा!

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