4th में हमारी क्लास की सोशल स्टडीज़ पढ़ाने वाली टीचर बहुत लाजवाब थीं।

4th में हमारी क्लास की सोशल स्टडीज़ पढ़ाने वाली टीचर बहुत लाजवाब थीं। उनके सिग्नेचर, बड़े ख़ास थे।

उनका पढ़ाने का तरीका बड़ा शानदार था। वो हिस्ट्री का कोई चैप्टर ज़ोर ज़ोर से पढ़ने लगती थी।

उनकी अंग्रेज़ी अच्छी थी, हमारी नहीं थी।

उनको तर्जुमा करना आता था, हमें पता ही नहीं था कि ट्रांसलेशन भी कुछ होता है। कुछ एक सीधे गौ बैक बेंचर तो बिचारे ऐसे भी थे जो ये सोचते थे कि वो दो मुख़्तलिफ़ कहानियाँ सुना रही हैं, एक अंग्रेज़ी में, एक हिन्दी में।

वो धारा प्रवाह अंग्रेज़ी और फिर हिन्दी पढ़ते हुए, सोमवार के एक पीरियड में एक चैप्टर सुना देती थीं और फिर पूछती थीं कि कुछ समझ न आया हो या कुछ पूछना हो तो पूछ सकते हो!

ठीक अगले 3 सेकंड बाद ख़ुद ही घोषणा करती थीं कि अच्छा ठीक है, कल हम इसके क्वेश्चन्स के आंसर ढूंढेंगे।

अगले दिन वह चैप्टर के हर सवाल का जवाब चैप्टर में जहाँ तहाँ भी हो, उसपर अंडरलाइन करवाती जाती थीं। वो बोलतीं “पेज नम्बर 69 में तीसरे पैराग्राफ की दूसरी लाइन, इसे पूरा अंडरलाइन कर लो”

अब यही अंडरलाइन किया हम सवालों समेत कॉपी में उतार लेते थे और एग्जाम से पहले रट लेते थे। हाँ ये भी अक्सर हुआ कि कभी पेज नम्बर 36 के आंसर के शब्द अगर 69 से मिलते जुलते हुए तो हम दोनों सवालों को गड्ड-मड्ड कर आते थे।

Movierulz (1)

वो टीचर पूरी क्लास की 2nd फेवरेट थीं। (फेवरेट की प्रियॉरिटी लिस्ट पर क्लास टीचर को रखना अनिवार्य था)

इनके पीरियड में कभी ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती थी। वो अलग बात है कि स्कूल छोड़ने के बाद फिर से सारी हिस्ट्री दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी में पढ़ी और तब जाना कि “हैं? अकबर का कोई पापा भी था?”

ऐसे अनगिनत टीचर हर स्कूल में हैं, इनसे यही इल्तेजा है कि जैसे थिएटर में एक्टर का पहला टास्क यही होता है कि सबसे पीछे बैठे दर्शक पर भी उसकी आवाज़ पहुँचनी चाहिए, ऐसे ही आप भी कोशिश करो कि आप जो बोल रहे हो, वो क्लास में आख़िरी बैंच पर बैठा बच्चा भी समझ पाए।

सबसे पहले तो हमें ट्विटर को अपना सर्वोच्च न्यूज़ सोर्स मानना बंद करना होगा।

जब आप कहते हो कि कुछ पूछना तो नहीं है… तो आप ‘नहीं’ लगाकर इस सवाल को स्टेटमेंट बना देते हो कि नहीं, तुम्हें कुछ पूछना नहीं है।

ग़लती से किसी कलंदर ने कुछ पूछ लिया तो आप दूसरी बड़ी हद तीसरी बार में इरिटेट हो जाते हो कि सारा दिन एक ही सवाल को थोड़ी देंगे, ट्यूशन में समझना, सिलेबस भी तो पूरा करना है।

कौन है ये सिलेबस? क्या फायदा है इसके पूरा होने का कि जब बच्चे की समझदानी ही आधी रह जाए?

बाकी तो आप बढ़िया पढ़ाते ही हो, आपकी क्लास के मार्क्स हो अच्छे आते हैं।

हैप्पी “क्लास से बाहर निकल जाओ” डे

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