2002 में आई राज़ एक ऐसी फिल्म थी जिसने हमारी चूलें हिला दी थीं।

देखो तब हम 10-11 साल के थे, इसलिए बिपाशा बासु और मालिनी शर्मा को देखने/ताड़ने की तो अपनी उम्र नहीं थी। डीनु मोरिया भाई की acting समझ सकें, इतने बड़े तो अपन आज भी नहीं हुए हैं। इसलिए राज़ में जो कैरिक्टर हमें सबसे रोचक लगा, वो था प्रोफेसर अग्निहोत्री का मिस्टीरीअस चरित्र।

पर इसमें भी एक ट्विस्ट था कि फिल्म थिएटर में तो देख नहीं सकते थे, इसलिए सेटेलाइट स्ट्रीम का इंतेज़ार किया और जब 6 महीने बाद फिल्म टीवी पर आई, तब टीवी की पिक्चर ट्यूब (genZ के लिए mythological गैजिट) ऐसी खराब हुई कि उसमें कलर दिखने बंद हो गए।

यहाँ कलर्स का स्पेशल ज़िक्र इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि फिल्म के एक इम्पॉर्टन्ट सीन में दिखाया गया कि प्रोफेसर अग्निहोत्री उस “बुरी आत्मा” को पकड़ने के लिए एक नींबू को घर में मंत्र फूँककर फेंक देते हैं और जब नींबू वापस उठाते हैं तो वो लाल हो जाता है।

पर हमारी बदकिस्मती, हमें नींबू ग्रे से गाढ़ा ग्रे होता ही दिखा और अपने मन में लाल नींबू देखने की चुल मच गई।

दुर्भाग्य से उन्हीं दिनों मम्मी रवि बाज़ार से 1 किलो नींबू ले आईं कि आचार बना लेंगी, पर व्यस्तता के चलते हफ्ते-दस दिन तक उन्हें देख भी नहीं पाईं और जब मुझ नन्हें बालक की उन 10 दिन पुराने नींबू पर नज़र पड़ी, तो डर के मारे तशरीफ़ चार टुकड़े हो गई!

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करीब 10-20 नींबू पीले से लाल हो चुके थे। मुझे लगा वो राज़ की मालिनी अब हमारे किचन में आ गई है।

इस इन्सिडन्ट के सालों बाद दुश्मन के गोकुल पंडित और संघर्ष के लज्जा शंकर को देखा। तबतक सिनेमा समझ 2002 से बेहतर हो चुकी थी। इस बेहतर समझ ने बताया कि नकली सिनेमा में असली acting क्या होती है। तब ये भी समझा कि आशुतोष राणा के निभाए किरदार बाकियों से इतने अलग, इतने कन्विन्सिंग क्यों लगते हैं।

मैंने साइलन्स ऑफ द लैंब्स संघर्ष से पहले देखी थी इसलिए खम ठोककर कह सकता हूँ कि संघर्ष को हॉलिवुड की पूरी कॉपी न कहे जाने का इकलौता कारण लज्जा शंकर था।

इसके बाद हम 90 वालों ने पतली कमर वाले टीवी पर बादल, ग़ुलाम, राज़, कसूर, हासिल, एल-ओ-सी कारगिल, कलयुग आदि फिल्में इतनी बार देखीं कि आशुतोष राणा से एक अलग ही एकतरफा सिनेमाई रिश्ता बन गया।

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पर 2010-11 के बाद, जब मैं अपनी गली के दोस्तों से दूर निकल, फिल्म रिव्यू और आर्टिकल्स लिखने लगा तो राणा जी की फिल्में ही दिखनी बंद हो गईं। जाने क्या हुआ कि मेन स्ट्रीम सिनेमा से वो अदृश्य होने लगे। फिर 2014 में हम्पटी शर्मा की दुल्हनियाँ रिलीज़ हुई। पर मैं स्टूडेंट ऑफ द ईयर झेल चुका था इसलिए वरुण को दोबारा देखने की हिम्मत नहीं कर पाया। (हालाँकि बाद में ये बड़ी ग़लती साबित हुई)

फिर बरसों बाद, राणा जी से दोबारा इंप्रेस होने का मौका उनकी एक शॉर्ट फिल्म – टेस्ट ड्राइव – ने दिया। इस फिल्म की कहानी तो औसत थी पर राणा जी कि

लुक लाजवाब था और acting के तो हम छुटपन से फैन थे।

इसके बाद ही मैंने हम्पटी शर्मा और सोनचिरैया देखी।

Cut to: बीते हफ्ते Lallantop के गेस्ट इन द न्यूज़ रूम में राणा जी आए। ये शो सारे रिकार्ड तोड़ 3 घंटे से ऊपर का बना। मज़े की बात ये कि मैंने ये शो रात 1 बजे से लेकर सुबह 4 बजे तक नॉन-स्टॉप देखा और समझा कि मैं अबतक आशुतोष राणा को जानता ही नहीं था।

अपने सिनेमा से बिल्कुल उलट राणा जी का अध्यात्म और गुरु भक्ति का वो चेहरा सामने आया जिसे देख मन mesmerize हो गया।

उनके सेंस ऑफ ह्यूमर से मेरा परिचय “मौन मुस्कान की मार” में हो गया था, पर उनके स्वभाव में अडिगता, विश्वास और जीवन के प्रति सकारात्मक रवैया देख मुझे ये फ़ील हुआ कि इस actor के पास इतना कुछ था सिनेमा को देने के लिए, पर सेम स्क्रिप्ट्स के चक्कर में हम कितना कम एक्स्प्लोर कर पाए इन्हें।

बहरहाल, आपके लिए राणा जी की वो कौन सी फिल्म है जो आप बार-बार देख सकते हैं?

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