स्वतंत्रता वीर सावरकर रणदीप हूड़ा की ऐतिहासिक पेशकश को समझने के लिए इतना समझें

‘सिंधु नदी से सागर तक इस विशाल भारत भूमि में जो भी इसे अपनी पितृ भूमि माने यानी अपने पूर्वजों की जमीन मातृ भूमि याने संस्कृति, भाषाओं, खानपान, त्यौहारों को अपना माने, वह हिंदू है’-विनायक दामोदर सावरकर

‘अल्पसंख्यकों का डर जानते है’-एमके गांधी
‘800 वर्षों की गुलामी में बहुसंख्यकों का दर्द समझते है’-सावरकर

स्वतंत्रता वीर सावरकर! रणदीप हूड़ा की ऐतिहासिक पेशकश को समझने के लिए इतना समझें। आपने यश चोपड़ा की ‘डर’ फिल्म देखी है, किस प्रकार नायक को पीछे धकेलकर खलनायक हो फ्रंट लाइन और लाइम लाइट में लाकर खड़ा कर दिया था। सबका चहेता बना दिया। खैर लेखक रणदीप, निर्देशक रणदीप, और अभिनेता रणदीप ने सिर्फ सावरकर को ही नहीं छुआ है बल्कि उन सभी वीर क्रांतिकारियों को दर्शकों के बीच रखा है जिन्होंने भारत राष्ट्र के लिये अपनी जान हँसते हँसते सौंप दी। अगर उनके दिमाग में भी सत्ता लोभ होता तो नाखून काटकर बड़े क्रांतिकारी बन जाते।

स्वतंत्रता वीर सावरकर

यकीनन स्क्रीन प्ले लेंथी अवश्य है लेकिन अंत तक बांधे रखता और सच की परतें खोलता चला जाता है। कई सवालों को जन्म दे जाता है। सोचने पर विवश करता है। सभी किरदारों को बैलेंस रखा गया है, वैचारिक भिन्नता जरुर दिखलाई, लेकिन नजरंदाज किसी को नहीं किया गया। किंतु, भारत के इतिहास में सावरकर को अवश्य साइड लाइन कर दिया गया और कुछ लाइंस में समेटकर रख दिया।

स्क्रीन प्ले सावरकर के तप और त्याग को सामने रखता है। साथ ही दिखलाता है कि अंग्रेज इतने भयभीत क्यों थे, दो बार काला-पानी का कारावास दिया। दरअसल, सावरकर विचार थे, भारतीयों को एकजुट करने की अद्भुत क्षमता थी। इसी के चलते विचारों को कुचलना चाहते थे। तभी तो ब्रितानी अधिकारी क्रेडॉक कहता है, ‘सावरकर कितना खतरनाक है एक ही मुलाकात में समझा दिया कि हम गलत कर रहे है’

वीर सावरकर

वाकई वीर सावरकर अंग्रेजों के दोस्त थे तो काहे उनके पूरे परिवार को तहस-नहस कर दिया। अकेले सावरकर को काला पानी नहीं, भाई को भी सजा सुनाई। आधिकारिक फाइनल कट स्क्रीन प्ले लंबा है तो यकीन मानिए, रफ कितना बड़ा रहा होगा, जिसे एडिटिंग टेबल पर काँट-छाँटकर छोटा किया गया। इससे लेखक की रिसर्च और मेहनत का अंदाजा होता है कि कितना पढ़ा होगा, हवा में ऐसे स्क्रीन प्ले नहीं लिखें जाते है। पहले हिन्दी स्क्रीन प्ले ने मोपला हिंदू नरसंहार का जिक्र करता है।

फिल्म देखकर समझ आता है। महेश मांजरेकर इतनी गहराई में नहीं जा पाते। जब लेखक ही निर्देशक है और उसे ही स्वयं अभिनेता को आदेश देना है तो तीनों की जुगलबंदी साफ दिखती है, लेखक ने जितना लिखा, निर्देशक उसे अभिनेता से निकलवा पाया। अभिनय में तो कोई संदेह नहीं है। अमित सियाल की केमेस्ट्री कमाल रही है। स्वतंत्रता वीर सावरकर ब्रदर्स का मिलन आँखें नम कर जाता है, क्योंकि एक ही जेल में रहने के बावजूद 9 साल बाद मिले।

जब कोई अभिनेता किसी किरदार के लिए गहराई तक उतर जाए तो समझ लो

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चाहे आप भूत में देखें या वर्तमान, आंदोलनों की सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आये राजनेता बेहद खोखले होते है और असुरक्षा भाव के रहे है। दूसरे प्रतिभावान व्यक्तित्व से डरे रहे है या उन्हें धूमिल करने का प्रयास किया गया है ताकि कोई खतरा न बनें। गांधी की मौत में सावरकर की भूमिका खोजना दर्शाता है। कड़वा और कोरा सच है, निस्वार्थ भाव वाले स्वतंत्रता सेनानी राष्ट्र के हित में जान देते चेले गये और सौदेबाजी वाले पोस्टर बॉय बैठें रहे और आखिर में वे ही मुखिया बनें।

ऐसा नहीं है तो सावरकर, भगत सिंह, राज गुरु, सुखदेव, आजाद, लाला लाजपत राय, को ही कठोर दंड क्यों मिला। बाकियों के सफेद कुर्ते पर तो लाठी का कोई निशान साक्षी न बना। रणदीप ने फिल्म नहीं बनाई है, भारतीय इतिहास को आँखें फाड़कर देखने पर मजबूर किया है विनायक सावरकर के बारे में तुम्हारे पास क्या है? बहुतेरे आएँगे और कहेंगे। फेक नैरेटिव, प्रॉपगैंडा फिल्म है। कोई बात नहीं है, मत देखो। वैसे भी देख नहीं पाओगे। परंतु, जिन्हें सावरकर में विश्वास है वे जरुर स्वतंत्रता वीर सावरकर देखें।

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