स्वतंत्रता वीर सावरकर फिल्म का रन टाइम ‘2 घंटे 58 मिनिट’ रखा गया है

जानते है स्वतंत्रता वीर सावरकर फिल्म का रन टाइम ‘2 घंटे 58 मिनिट’ रखा गया है। सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट के बाद फिल्म ड्यूरेशन तय होता है। अर्थात् लेखक-निर्देशक रणदीप हुड्डा ने सावरकर को कितना समझा होगा। पक्ष-विपक्ष सभी किताबें पढ़ी, क्योंकि भारतीय इतिहास में चाटुकारों ने सिर्फ माफीवीर लिख है। उनके योगदान और त्याग को धूमिल कर दिया गया।

लगभग तीन घंटे में रणदीप भारतीयों को बतलाएँगे कि स्वतंत्रता वीर सावरकर का अर्थ क्या है और गोरों ने दो बार कालापानी की सजा क्यों सुनाई थी। अभिनेता रणदीप ने सावरकर के लिए अपनी बॉडी को रिस्क में काहे डाला। यकीनन लेखक-निर्देशक रणदीप की तैयारी गहन-रिसर्च किरदार की माँग रही होगी। मतलब सावरकर से मिलने निकले है तो महज खानापूर्ति नहीं बल्कि भीतर तक गये है ताकि उन पहलुओं को रखा जाये, जो वास्तव है और दर्शक उनसे अनिभिज्ञ, अभी तक कुछ लाइंस में पढ़े और समझे।

स्वतंत्रता वीर सावरकर

क्योंकि जितना गांधी-नेहरू पढ़ाये गये है तो स्वतंत्रता वीर सावरकर को भी निष्पक्ष भाव से पढ़ाना चाहिए था और पाठकों के विवेक पर छोड़ना था कि सावरकर क्या थे। तथाकथित परफ़ेक्टनिस्ट का खूब महिमामंडन हुआ है कि किरदारों से मिलने के लिये कोई कमी नहीं छोड़ते है। सिनेमा में परफ़ेक्निस्ट की परिभाषा में कलाकार सेगमेंट में देखेंगे तो बिना किंतु-परंतु के रणदीप का नाम बोल्ड अक्षरों में लिखा हुआ है। भले इन्हें इतना फोकस नहीं मिला, लेकिन असलियत कभी छिपती नहीं है।

स्वतंत्रता वीर सावरकर

ये फिल्म के सिनेमा में परफ़ेक्टनिस्ट की पूरी व्याख्या को सिरे से लिखेगी, क्योंकि मेथड ऐक्टर जब अपने किरदारों को रियल बनाने के लिए इतनी मेहनत कर सकता है तो कैप्टन ऑफ़ शिप बनें तब उसे पूरी स्वतंत्रता मिल जाती है अपने किरदार को किस प्रकार दिखाए, प्रभावी लगे। कलाकार सदैव निर्देशक का होता है। जैसा चाहे वैसे दिखला सकता है, लेकिन जब आप खुद लिखावट में है तो किरदार को ज्यादा अच्छे से रख सकते है।

दरअसल, तब तीन दृष्टिकोण होते है। लेखक-निर्देशक और अभिनेता, इन तीनों के कॉम्बिनेशन से बढ़िया परिणाम निकलता है। रणदीप के हाथ में फ़िल्म है तो बजट भी सीमित और उचित खर्चा गया होगा। कल 22 मार्च रणदीप और स्वतंत्रता वीर सावरकर के बारे में लिखेगा। सत्तर-अस्सी वर्ष पहले किन-किन रहस्यों को पब्लिक डोमेन में आने से रोका और एक सिने कलाकार ने निष्ठाभाव से उन्हें छूने की कोशिश की, अपने आप को जोखिम में डाला। नेम-फेम और अन्य स्वार्थ होता तो फिल्म करके भी पूरा हो सकता था। इतना डिटेलिंग में जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

लेकिन मेथड कलाकारों की यही खूबी है वे किरदारों को अपने भीतर उतारकर बाहर लाते है, इसलिए कभी कभी किरदार भी कलाकारों से प्रेम कर बैठते और इस कदर केमेस्टी रखते है। दर्शक पहचान नहीं पाते है कलाकार है या किरदार। रणदीप के साथ सावरकर, उसी स्तर पर पहुँचा दिए है जहां हीथ लेजर जोकर से पहुँचे थे। इन दिनों रणदीप से मिलें और ऑब्जर्व करे तो जानेगा कि जाट लड़का सावरकर में कितने करीब जाकर लौटा है, या कहे अब भी वही है। हालाँकि आपसे बातें अवश्य कर रहा है किंतु उसका दिमाग स्वतंत्रता वीर सावरकर में ही है। इससे लौटने में थोड़ा समय लगेगा।

जब कोई अभिनेता किसी किरदार के लिए गहराई तक उतर जाए तो समझ लो

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मैंने रणदीप के कुछ इंटरव्यू देखें है और आँकलन है। लठ गाड़ दिया सै। मैं सभी कंटेंट देखता हूँ। उनके किरदारों से कलाकारों-हीरो की गंभीरता मालूम चल जाती है। कितने मेहनत का मामला रहा है। बस कल सुबह से स्वतंत्रता वीर सावरकर सभी के नजदीकी सिनेमाघरों में होंगे। रणदीप में करियर की अब तक की सबसे बड़ी फिल्म है। इसकी सफलता बहुत कुछ देकर जाएगी, अलग लाइन खींच देगी और असफलता ज्यादा कुछ प्रभाव न डालेगी।

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