स्वतंत्रता वीर सावरकर ने अपने दूसरे दिन अच्छी ग्रोथ ली है?

स्वतंत्रता वीर सावरकर ने अपने दूसरे दिन अच्छी ग्रोथ ली है और 2 करोड़ प्लस पहुँची है। फिल्म को लेकर कई विचार पढ़े है और लगातार पढ़ रहा हूँ। तो एक बिंदु बहुत कॉमन झलक रहा है। सावरकर को ऊपर रखने के लिए एमएके गांधी को कमतर किया गया है। सही बात है ऐसा नहीं होना चाहिए था। लेकिन….लेकिन! फिल्म को देखिए और इसमें जितने किरदार है उनमें से आप मदन लाल ढिंगरा, खुदीराम बोस, गणेश सावरकर आदि क्रांतिकारियों से परिचित थे, इनके बारे में पढ़ा था?

स्वतंत्रता वीर सावरकर

हमारे यहाँ स्वतंत्रता परिप्रेक्ष्य में फिल्में बनती आई है उनमें गांधी, नेहरू, जिन्ना, पोस्टर बॉय रहते आये हैं क्योंकि जब ब्रिटेन से स्वतंत्रता मिली थी तब इनके हाथों में ही सौंपी गई तो इतिहास के पन्नों में यही लिखे गये। बाकियों के प्रयास और उनकी जान की कोई अहमियत नहीं समझी। रणदीप हूड़ा ने ऐसे क्रांतिकारियों को स्क्रीन प्ले में रखा है जिनके बारे में अधिकतर नहीं पढ़े होंगे, क्योंकि लिखा ही नहीं गया है। इतिहास को फिल्म परिवेश में समझेंगे, निर्देशक फिल्म में हीरो को ज्यादा तवज्जो दे, तब दूसरे किरदार स्वतः पीछे छूट जाते है।

वीर सावरकर

भारत के स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाओं के साथ ऐसा ही कुछ हुआ है तो अब वे बाहर लाए जा रहे तब तथाकथित छवि जितनी बनाई गई है वे टूट रही है। एमके गांधी का अपमान दिख गया लेकिन उन क्रांतिकारियों का क्या जिन्हें इतिहास में कुछ लाइन देकर अपमानित किया गया। अकेले सावरकर की बात नहीं है, स्वतंत्र भारत के लिए जो भी उन दिनों अपनी जान की परवाह किए बिना लड़ा, वे सभी समान योद्धा थे। कोई बड़ा छोटा नहीं था। किंतु कुछ बहुत बड़े बना दिये गये और वही सर्वेसर्वा हो चले।

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ऐसी फिल्मों को फिल्म की तरह नहीं अपितु दस्तावेज के स्वरूप में देखा जाना चाहिए। आपको एक परपेक्शन बतलाता हूँ। जो फैलाया जाता रहा है और जा रहा है। बदायूँ की घटना को पापा की परी मेरा अबुल सबसे अच्छा है फ़ॉर्मेट में पैरवी कर रही थी और इन सभी हालातों की जिम्मेदारी वर्तमान सत्ता को देती जा रही थी। अर्थात् सही-ग़लत का कोई ऑप्शन नहीं था, सीधे एकतरफा राय दिमाग में बैठाई गई कि इसके पीछे सिर्फ भगवा ही है। बहस चल रही थी मैं चुपचाप सुन रहा था और सब घटनाक्रमों पर एक ही जवाब, क्रिया की प्रतिक्रिया हो रही है। सिस्टम आज भी अपने एजेंडे में लगा हुआ है। हम लोग नैतिकता और सही-गलत के ज्ञान में फँसकर बुद्धिजीवी बनने की कोशिश में लगे हुए है खैर।

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