विवेक ओबरॉय के करियर में फिल्म है, ‘क्यू हो गया न’ दर्ज है

विवेक ओबरॉय के करियर में फिल्म है, ‘क्यू हो गया न’ दर्ज है। 7वी फिल्म थी। इसे फिल्म न देखें, बल्कि षड्यंत्र समझा जाना चाहिए। स्टारकिड स्कीम से हटकर विवेक में अपने बूते राम गोपाल वर्मा की कंपनी में चंदू नागरे किरदार से मिलें, या कहे 3 सप्ताह की कड़ी तैयारी के बाद चंदू के करीब पहुँचने में सफल हो पाये। चंदू के लिए बॉडी ट्रांसफॉर्मेशन में इतना घुस गये थे कि हर-हाल में मुलाकात करनी थी ताकि कंपनी जॉइन कर सके। तिस पर पिता सुरेश ओबरॉय द्वारा निर्मित व अब्बास-मस्तान के निर्देशन वाले कंटेंट को ना कह दिया था।

विवेक चंदू के साथ डेब्यू किए और अभिनय की दुनिया में तहलका मचा गये। दौर का फर्क है, बाकी पीआर एजेंसी और सोशल मीडिया का जमाना रहता तो विवेक तगड़ा हाईअप लेते। इसी क्रम में ऋतिक रोशन भी होते। खैर कंपनी, रोड, साथिया, दम और युवा से विवेक बॉलीवुड में ए लिस्टर में लाइन-अप थे और भविष्य में बड़े स्टार की छवि उभरने लगी थी। ऐसा कलाकार जो अपने किरदारों को दर्शकों से जोड़ने के लिए परिश्रम करने में कोई झिझक न रखता। धीरे धीरे सीढ़ियाँ चढ़ रहा था और यशराज से साथिया मिली थी। यकीनन अच्छे फिल्म मेकर्स की पकड़ में आते तो बेहतरीन किरदार देखने को मिलते, लेकिन ग्रोथ लेते करियर में डॉउन फॉल कर प्रवेश ले बैठा, विवेक समझ न सके और साजिशन करियर को आग लगा बैठें।

आग से उठे धुंए ने विवेक की चमचमाती जिंदगी को डार्क फेज में धकेल दिया। सोचें, षड्यंत्रकारियों की सनक ने पहले फुटपाथ पर लोगों को कुचला, फिर विवेक के अच्छे-भले करियर पर पेट्रोल छिड़क डाला। इसमें विवेक की गलती भी उतनी ही है कि वे स्थिति की भाँप न सके। क्योंकि इनका उदय ऐसे वक्त हो रहा था जब कंट्रोल दुबई में बैठें भाई लोग कर रहे थे। नया नेवला छोकरा उनकी टीम को टक्कर दें, लाइम लाइट लेकर पूरे परसेप्शन को बदल दें, ऐसे कैसे संभव है। दूसरी ओर कहो ना प्यार है भी सिर दर्द बढ़ा चुकी थी।

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बॉलीवुड में भी जबरा सिस्टम है। इससे बाहर वाला जो भी आता है उसे सिस्टम वायरस मानता है और जल्द किल करने निकल जाता है। इनका एंटीवायरस मेंटल और हैल्थ स्तर पर वॉर करता है। इस वार को झेलना टफ है। विवेक को दोनों साइड से टारगेट किया गया, लेकिन इन्होंने सहन किया और अपने सनातनी संस्कारों से बैड फेज को निकाल गये।

हैरत है कि किसी शख्स का ईगो इतना बड़ा हो जाता है जो अपनी सनक में दूसरे का करियर व जीवन तबाह करने पर तुला रहता है। लड़ाई-झगड़े खूब होते है, परंतु ऐसा स्वरूप अकेले का नहीं हो सकता है, इसके पीछे बड़ी टीम होती है। पूरा सिस्टम है विवेक को कोई काम न दें, प्रोडक्शन हाउस मान भी लें। इन्हें सिस्टम से दूर करने के बाद तंज में पूछा होगा, ‘क्यू हो गया न’ आखिरकार विवेक ने सार्वजनिक मंच से सॉरी कहा, फिर भी ईगो कम न हुआ। हद है। ऐसा ही ईगो अरिजीत सिंह के साथ घटित हुआ था हालाँकि अभी माफी माँगने से सुलह हो सकी है।

विवेक इंटरव्यू में कहते है और अहसान मानते है, अक्षय कुमार ने मुश्किल समय में कुछ काम डाइवर्ट किया, लेकिन खुलकर नहीं आये, बैक से सपोर्ट किया। अक्षय भी सिस्टम से बाहर नहीं निकल सकते थे। उम्दा अभिनेता और शानदार ह्यूमन बीइंग को बर्बाद कर दिया। उधर, ह्यूमन बीइंग ब्रांड से फुटपाथ वाले पाप का पश्चाताप करते घूमते है। विवेक के जीवन में ईगोस्टिक दौर न होता तो वर्तमान में बहुत बड़े अभिनेता रहते और सॉलिड किरदार देखने को मिलते, संदीप रेड्डी वांगा विवेक के साथ सोलो आयें तो कर्रा कंटेंट व किरदार देखने को मिलेगा।

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क्योंकि इनके हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज जब किसी किरदार से कनेक्ट करते है तब अद्भुत कॉम्बिनेशन निकलता है। किंतु ऐसा अब होगा नहीं, सोलो तो कतई नहीं, सपोर्टिंग अवश्य हो सकता है। सोलो में कॉर्पोरेट टांग अड़ाएगा। उन्हें बड़े चेहरे चाहिए। विवेक का समय बीत गया है, या कहे उलझाया गया। एकाग्रता भंग कर दी गई, अब साइड हो चले हैं। फिर भी अभिनय में किरदार मायने रखते है सोलो हीरो जैसा कुछ नहीं होता है। विवेक अच्छे फिल्म मेकर्स के साथ आये और दमदार किरदार देखने को मिलें।

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