वाकई आदित्य ने फिल्म को असल घटनाक्रम से स्क्रीन प्ले दिया है जब इसे देखेंगे

सत्ता की हनक अर्थात् पॉवर कैसी रहती है, क्या क्या खेला किया जा सकता है। विपक्षी दल अच्छे से जानते है। तभी तो लोकतंत्र खतरे में और हर चुनाव को आखिरी चुनाव का रुदन सुनाई देता है। जिस प्रकार अमेरिका ने आईटी के क्षेत्र में अपना हब बनाया है वैश्विक स्तर पर इसी हब से अधिकतर सिस्टम चलते है। ठीक उसी प्रकार भारत में तत्कालीन केंद्र व राज्य सरकारों ने सिस्टम बनाया और बहुत मजबूत स्वरूप दिया। इसलिए तो भले सरकारें बदलती गई, लेकिन सिस्टम वही रहा। सिस्टम भी ऐसा वैसा नहीं, पूर्णतया हाई सिक्योरिटी के साथ खड़ा किया। गैर-सिस्टमवादी सरकार इसे समझने बैठे तब तक उसका कार्यकाल खत्म हो और सरकार पुनः उनकी आ जाये।

लेकिन वर्तमान में सिस्टम को रीबूट किया जा रहा है इसलिए सिस्टम के ऑपरेटर चिल्लम-चिल्ली कर रहे है। फिल्म मेकर आदित्य धर ने सिस्टम को बड़े आसान शब्दों में सिनेमाई पटल से दर्शकों को समझाने की कोशिश की है और मुद्दा लिया है। आर्टिकल-370! स्वतंत्र भारत का सबसे विवादित और षड्यंत्रकारी मुद्दा रहा है जिसने भारत के मुकुट को बेड़ियों से बाँधकर बंदी बना रखा था। 1947 से 1965 के दौरान पूर्ववर्ती केंद्र सरकारों ने चतुराई से जम्मू-कश्मीर की शक्ति को मन माफिक इधर-उधर किया, बल्कि असल साक्ष्यों को भी दृश्यम फिल्म की भाँति रहस्यमय बनाए रखा। कोई सोच न सके, कहाँ रखें है।

दिल्ली केंद्र में कोई भी चाचा चौधरी आ जाये, अपने कार्यकाल में सिस्टम को भेदकर मालूम कर लें, कि धारा-370 का तोड़ क्या है। संभव ही नहीं था। यकीनन, पहले प्रधानमंत्री ने भारत को कभी एकीकृत करने की रणनीति पर ध्यान न दिया। तत्कालीन गृह मंत्री न होते तो भारत की अन्य रियासतें जम्मू-कश्मीर की तरह स्पेशल स्टेटस के साथ दो निशान, दो विधान के साथ चल रही होती। उन दिनों सत्ता नई नई आई थी तो अपना अपना देखो वाली थ्योरी रखी। जम्मू कश्मीर को शैख अब्दुल्ला को परोसकर दे डाला। वाकई आदित्य ने फिल्म को असल घटनाक्रम से स्क्रीन प्ले दिया है जब इसे देखेंगे, तो आँखें हैरानी से खुल जाएँगी।

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वर्तमान सरकार पिछले 10 सालों से केंद्र में बैठी है और सिस्टम को रिबूट करने लगी तो विपक्ष तिलमिला उठा है। क्योंकि बिजनेस नुमा सिस्टम को ध्वस्त कर देंगे तो कमाई के साधन खत्म हो जाएँगे, ऐसे सिस्टम एक-दो साल में खड़े नहीं होते है बल्कि वर्षों की तपस्या लगती है। अपने मोहरे बैठाने पड़ते है। सैकड़ों प्रपंच रहते है, उन्हें तोड़ा जा रहा है तो ग़ुस्सा आएगा ही न।

मौजूदा सरकार ने समय लिया और उस लेवल पर सोच को ले पहुँचें है जिसका अनुमान तत्कालीन खेलदारों को न था और ऐतिहासिक 5 अगस्त 2019 ने कश्मीर सिस्टम से स्वतंत्र करवाया और भारत को दोबारा मुकुट पहनाया है। हालाँकि अब भी अधूरा है। इसके कुछ टुकड़े पड़ोसियों के पास है। आदित्य ने स्क्रीन प्ले को अपनी पिछली फ़िल्म की तरह पार्ट्स में बांधा है। कुल पाँच चैप्टर है जो कश्मीर की गुलामी को दर्शाते है। एंगेजिंग, मिस्टीरियस, ग्रिपिंग और फुल थ्रिलिंग है।

यामी गौतम और प्रियामणि इस आर्टिकल की दमदार अनुच्छेद बनकर आई है, बॉडी लैंग्वेज और हाव भाव शानदार है। यामी ने फील्ड व प्रिया ने डिप्लोमेट को उम्दा तरीके से सम्भाला है। अरुण गोविल, जिस अंदाज और बॉडी ट्रांसफॉर्मेशन के साथ पीएम मोदी को लेकर निकले है। बहुत सटीक बैठे है। वाइड शॉर्ट में तो कमोबेश सेम टू सेम लगते है वही, क्लोज में भी लुक और फेसिअल एक्सप्रेशन से रियल झलक देने में कामयाब रहे है। गृह मंत्री थोड़े वीक लगे।

5 अगस्त 2019 का दिन वर्तमान गृह मंत्री के जीवन काल में सबसे यादगार पल रहेंगे और ये घटनाक्रम काफी एग्रेसिव था तो किरण कर्माकर खरे न उतरे। बाकी सभी कलाकार ठीक रहे है। सभी ने आर्टिकल 370 देखनी चाहिए और सोचें कि कैसे कश्मीर को वर्षों तक दूर रखा और कश्मीरी तो भारत में आ सकते थे लेकिन भारत के लिए आर्टिकल स्वरूपी ब्रिज बना दिया। भारत से आर्थिक पैकेज तो जाये लेकिन हिसाब-किताब कोई न माँगे। इससे राज्य सरकार इतनी शक्तिशाली थी।

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बुरहान वानी को आतंकी से हेडमास्टर का बेटा बतलाकर सिंपथी क्रिएट करवाई और कश्मीर को अशांति की ओर धकेलने में सिस्टम का ही खेल था। आदित्य धर की फिल्म मेकिंग का ही नतीजा है कि यामी गौतम और प्रिया मणि के कंधों पर आर्टिकल टिकी है और बॉक्स ऑफिस पर अच्छी वेव जनरेट कर गई है। बाकी अभिनेत्रियों के नेतृत्व में ऐसा मुश्किल रहता है।

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