भक्षक! 2018 मुजफ्फरपुर बिहार बालिका गृह कांड को सिनेमाई पटल पर रखता है।

संयोग देखिये, 9 फरवरी को नेटफ्लिक्स ने पत्रकारिता का मूल कर्तव्य समझाने के लिए कंटेंट दर्शकों के बीच छोड़ा है। तो वही, 10 फरवरी के दिन एक पत्रकार को सत्तारूढ़ दल से कड़े और सख्त सवाल पूछने के एवज में राज्य सभा टिकट रूपी सम्मान दिया है। ताकि पत्रकारिता में जुटे पत्रकारों को प्रोत्साहन मिले, कि आखिर कैसे पत्रकारिता की जाती है। भक्षक! रेड चिलीज एंटरटेनमेंट द्वारा प्रस्तुत कंटेंट 2018 मुजफ्फरपुर बिहार बालिका गृह कांड को सिनेमाई पटल पर रखता है।

लेखक जोड़ी ज्योत्सना नाथ और पुलकित ने स्क्रीन प्ले एंगेजिंग व थ्रिलिंग लिखा है, टेंशन, डर, दया, ग़ुस्सा, सारे इमोशन अच्छे से भरे हुए है। पहली ही फ्रेम से कहानी व किरदार जकड़ लेते है। अर्थात् मुन्नवरपुर बालिका गृह में प्रवेश कर लिया तो निकलना संभव नहीं है तिस पर प्रोडक्शन डिजाइन में भी कंटेंट कनेक्टिव है। हालाँकि लेखक ने असल घटनाक्रम से रील में किरदार कम रखें है। ये जो कंटेंट है रोंगटे खड़े कर देने वाला है।

हवस के भेड़िये मासूम बच्चियों तक को नहीं छोड़ते है, यौन शोषण तक ही नहीं रुकते है। हत्या भी कीड़े-मकोड़े की तरह करते है। क्लाईमेक्स फाइनल वर्डिक्ट तक हो सकता है। लेकिन लेखक तंज तक सीमित रहे है, जो खलता है। क्योंकि कंटेंट ओरिजनल इवेंट पर आधारित है। गलत क्या होता है? “इस दुनिया में कोई भी कम हर आदमी के अपने अपने ढंग से सही होता है, गलत तो कुछ होवे ही नहीं करता है। लेकिन जब कोई बेवजह किसी के पीछे पड़ जाये तो ये गलत होवे है”

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संवाद कंटेंट के मुख्य खलनायक बंसी साहू द्वारा पत्रकार वैशाली सिंह को कहा जाता है। आदित्य श्रीवास्तव के सामने अन्य कलाकार ठीक है अपने किरदारों को अच्छे से रखते है लेकिन दुर्गेश कुमार जो है न, छोटे से स्क्रीन प्रिजेंस में दिखला गये है कि, “देख रहा है न?”। हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज जहर है। आदित्य की बंसी साहू से मुलाक़ात, डायलॉग डिलीवरी और फेसिअल एक्सप्रेसन उम्दा है। उन्होंने किरदार की डिमांड पर उस स्तर का बॉडी ट्रांसफॉर्मेशन दिया है, जब भी स्क्रीन पर रहते है तब डर का माहौल क्रिएट करके जाते है।

फिल्म में एसएसपी जसमीत कौर कहती है, “सिस्टम की यही खासियत है, एक हाथ पॉवर तो देता है लेकिन दूसरे हाथ छीन भी लेता है” सिस्टम! अगर आप राजनीति में रुचि रखते है तो इस शब्द से परिचित होंगे। फिल्मी कंटेंट के माध्यम से सुना अवश्य होगा लेकिन समझ राजनीतिक नज़रिया देता है। दरअसल, जो सिस्टम रहता आया है न, इससे बाहर ऐसे मुद्दे कतई सामने नहीं आते है। सबकुछ सिस्टम में असेम्बल रहता है अगर इतर कोई गया नहीं कि धाय की आवाज गूंजती है।

सुने होंगे, भले सरकार उनकी है लेकिन सिस्टम हमारा है, बहुतेरे खेला होवे है। बंसी साहू के तेवर कमोबेश जंगल राज वाले ही थे। किसी से भय न था, पुलिस को ऐसे हड़काया कि मानो कुछ है ही नहीं, ऐसी दबंगई बेलगाम पॉवर में आती है। हैरानी है कि बिहार में जंगल राज के बाद जो सरकार आई थी उसे लॉ एंड ऑर्डर सुधार में बढ़िया माना गया। परंतु अचरज बालिका गृह में जंगल राज चल रहा था, इसकी जड़ें काफी मजबूत रहीं होगीं तभी इतने समय तक बाहर न आया। सरकारें आती जाती रहती है सिस्टम वही रहता है और वैसे ही चलता है। फर्क तब पड़ता है जब सिस्टम पर चोट पड़े।

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सिस्टम ही तो है पत्रकार सेलेक्टिव मुद्दों को लाते है और दूसरों को छोड़ देते है। तभी तो पुरस्कार में सांसदी मिलती है। निष्पक्षता को घर की खूँटी पर टाँग कर निकलते है। कुछ पत्रकार हिम्मत करके मुद्दों पर आते है तब उन्हें झूठे केसों में फँसाकर जेल में महीनों बंद रखा जाता है। इस पॉइंट को पक्ष-विपक्ष वाली बहस में लाकर आसानी से बर्बाद किया जा सकता है।

इसलिए दूसरी बात कलयुगी दुनिया में बिन स्वार्थ कुछ भी नहीं होता है और बंसी साहू का डायलॉग सटीक बैठता है। कोई भी क्षेत्र हो, महत्वाकांक्षा सदैव रहती है और सही-गलत इसी के गुलाम होते है। फिल्म अच्छी है। सभी ने देखनी चाहिए। रेड चिलीज ने जिस मुद्दे को रखा है इसे सीरीज स्वरूप देकर इसी तरह के अन्य मुद्दों पर फोकस करना चाहिए। कई सूबे है जहाँ जंगलराज बदतर हालातों में है हिंसा-बलात्कार के केसेज भरे पड़े हैं।

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