कुछ बरस पहले, एक रोज़ मन बड़ा खराब था।

कुछ बरस पहले, एक रोज़ मन बड़ा खराब था।

नौकरी ऐसी थी कि दफ्तर घुसते ही सबसे पहले नज़र घड़ी पर जाती थी और गणित लगाती थी कि 6 बजने में अभी कितना समय बाकी रह गया है।

खिसियाया आदमी क्या करता है? एक पत्थर उठाता है और हवा में उछाल देता है और सोचता है आसमान में सुराख हो जायेगा।

मुझे वरुण ग्रोवर का एक ट्वीट दिखा, मैंने तुरंत उसको ट्वीटर पर इनबॉक्स किया और लिखा “मुझे आपकी email आईडी चाहिए”

तकरीबन तुरंत रिप्लाई आया।

मुझे तो भड़ास निकालने का मौका मिल गया। पहले तो मसान और वरुण के लिखे दर्जन भर गानों की तारीफ की, फिर दो-चार गानों को सिरे से खारिज बताया, और फिर पौवा पिए आशिक की तरह सब उगल दिया कि क्या कर रहा हूँ, क्या समस्या है, क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।

Movierulz (1)

गनीमत ये रही कि मैंने हर एक बात को बुलेट नंबरिंग में लिखकर दिया।

कमाल देखिए, देर रात जवाब में वन-बाई-वन पॉइंट आए और लेखन के प्रति भरोसा बना रहे इतना बारूद भी मिल गया।

अच्छा जी इसके बाद धन्यवाद खत्म-टाटा-बाये-बाये हो गया।

कुछ दिनों बाद मुझे एक कहानी मिली। कहानी कुछ यूँ थी कि –

वरुण ग्रोवर जब नए-नए मुंबई आए थे तब बड़ी मुश्किल-मशक्कत से उन्हें टीवी इंडस्ट्री में काम मिला था पर उन्हें तो सिनेमा के लिए लिखना था! लेकिन ये वो सिनेमा नहीं था जो शाहरुख सलमान करते हैं; बल्कि ये वो सिनेमा था जो इरफान साहब किया करते थे।

वरुण दूरदर्शन के सीरीअल्स के समय से इरफान साहब के माद्दा, उनके प्रशंसक रहे थे।

एक रोज़ इत्तेफाकन उन्हें इरफान साहब एक मॉल में दिख गए। वरुण ने डरते-हिचकते अपना परिचय दिया। इरफान साहब तो इरफान साहब थे, उनका कद इतना बड़ा था कि उनके साथ खड़े किसी भी शख्स को ये एहसास नहीं होता था कि वो छोटा कलाकार है।

इरफान साहब ने वरुण से बातें की, उन्हें कॉफी पिलाई और फिर मिलने का वायदा कर वरुण को नई ऊर्जा दे दी।

Cut to:

वरुण को मेल भेजने के कुछ साल बाद मैं मुंबई आया, मुझे जाने क्यों वही किस्सा याद आया। तबतक वरुण से मेरी दो एक बार और फॉर्मल बातें हो चुकी थीं। मैंने फुल लफ्फाजी से भरी mail कर दी कि अब मैं मुंबई आया हूँ, आप मिलों, कॉफी पिलाओ।

2 दिन बाद खुशियों से भरा जवाब आया कि बहुत अच्छा लगा यहाँ आए, कुछ दिन का समय दो, ज़रूर ज़रूर मिलेंगे।

बीते दिन 1 फरवरी को मिलना हुआ, अब email में तो नाम ही दिखता है, सूरत तो मटर के दाने से भी छोटी नज़र आती है; सो ईवेंट के अंत में तस्वीरों के समय मैंने धीरे से कहा “वरुण भाई, मैं सिद्धार्थ…. अरोड़ा ‘सहर’

अव्वल तो चंद्रयान 3 सच्ची में उतरा भी है कि नहीं इसी पर डाउट होना चाहिए।

अचानक आँखों में चमक आई। आवाज़ ऊँची हुई और बोले “अरे यार, तुम तो बहुत बढ़िया मेल लिखते हो; ऐसा flow और brevity कम ही देखने को मिलते हैं” मैंने आने वाली फिल्म all India rank के बारे में बात की, अगली मुलाकात के लिए समय ले लिया कि….

एक भाईसाहब, नॉन-टेकफ्रेडली वरुण के साथ सेल्फ़ी लेने के लिए इतने आतुर दिखे कि स्टेज के कोने में फँस के अप्रोच करने लगे। वरुण ने उनके मोबाईल के फ्रन्ट कैमरे में झाँका, वो पिक्चर खींचने की कोशिश करने लगे पर शायद नर्वसनेस में समझ ही न पाए कि स्क्रीन पर कहाँ अंगूठा लगाना है।

वहाँ बेसब्र लोगों का तांता लग रहा था, पर वरुण ने बिना फ्रस्ट्रैट हुए, न सिर्फ उन्हें सिखाया बल्कि मुस्कुराते हुए दनादन 4-6 सेल्फ़ी भी लीं। उन अंकल के चेहरे पर ये बड़ी कॉलगेट वाली स्माइल आ गई।

कोई कलाकार कैसा है ये तो टीवी, सिनेमा, ओटीटी और बड़े-बड़े मंच पर बोले बड़े-बड़े बोल से पता चल जाता है पर वो कलाकार इंसान कैसा है ये तब पता चलता है जब वो अनजाने आदमी को भी ये फ़ील नहीं होने देता कि वो उससे कमतर है।

उन अंकल की तरह ही, मैं भी मुस्कुराता, झूमता, एक नई ऊर्जा लिए घर चला आया।

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